प्रमाणिकता को लेकर उठ रहे सवाल
ग्रोथ नहीं, ग्रोथ प्रमोटर से…!
भाटापारा। पौधों की बढ़वार पर रोक। छिड़काव कर रहे हैं उस ग्रोथ प्रमोटर का ,जो उर्वरक के साथ लादन के रूप में मिली है, लेकिन परिणाम शून्य आता देखकर किसानों के होश उड़ रहे हैं।
यूरिया सहित उर्वरक भी दूसरी किस्म की बेतरह संकट का सामना कर रहे किसानों के सामने, बड़ा संकट इस समय यह आ रहा है कि मनमानी कीमत और लादन की शर्त पर जो सामग्री उन्हें दी गई थी, उसका छिड़काव सफल परिणाम नहीं दे रहा है। बड़ी मात्रा में किसानों के पास पहुंची ग्रोथ प्रमोटर का छिड़काव ,जब पौधों की बढ़वार के लिए किया गया तब, जैसे परिणाम मिलने थे, वे नहीं आ रहे हैं। क्या यह नकली हैं ? या कालातीत हो चुके हैं ? जैसे सवाल यक्ष प्रश्न बनकर सामने हैं। मदद की आस में बैठे हैं किसान।
पालन नहीं नियम का
कंपनियों के द्वारा भेजी गई उर्वरक की अनलोडिंग, उर्वरक निरीक्षक के सामने होनी चाहिए। विक्रय के पहले विभाग की प्रयोगशाला में इस उर्वरक का परीक्षण होगा। सही मिलने की स्थिति के बाद ही, इसका विक्रय किया जा सकेगा, लेकिन खानापूर्ति के बाद किसानों के हाथ पहुंच रही ऐसी उर्वरक, यदि सही परिणाम नहीं दे रही तो, जिम्मेदार किसे माना जाए ? सवाल गंभीर है, लेकिन जवाब नहीं मिल रहे।
मनाही, फिर भी
कृषि संचालनालय ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि किसी भी उर्वरक के विक्रय के साथ लादन के रूप में अतिरिक्त सामग्री नहीं दी जा सकती लेकिन किसानों तक, उर्वरक के साथ पहुंच रहे सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशक, जैव प्रेरक और ग्रोथ प्रमोटर, यह साबित करने के लिए काफी है कि लापरवाही किस हद तक चल रही है।
पौधों की बढ़वार नहीं
यूरिया के साथ जबरदस्ती में दी जा रही, ऐसी सामग्रियां भी बिना परीक्षण के किसानों तक पहुंच रही है। जिसके छिड़काव से ना तो कीट प्रकोप से छुटकारा मिल रहा है, ना पोषक तत्व पौधों तक पहुंच रहे हैं। रही बात ग्रोथ प्रमोटर की, तो इसका छिड़काव भी किसानों को हताश ही कर रहा है क्योंकि पौधों की बढ़वार में कोई अंतर नजर नहीं आ रहा है। यह आगत संकट का संकेत ही माना जा रहा है।

