जिरहुल से मिले प्राकृतिक रंग और पारंपरिक औषधि
बिलासपुर। एग्रोफाॅरेस्ट्री और मिश्रित खेती को लेकर बढ़ते रुझान के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी नील की खेती संभव होने जा रही है।
नाम है इंडिगोफेरा टिंक्टोरिया। पहचानी जाती है जिरहुल के पौधे के रूप में। पत्तियों में अनमोल गुण की वजह से इसे नील का पौधा कहा जाता है। विभिन्न शोध परिणाम के बाद अब इसकी भी व्यावसायिक खेती संभव हो चली है। कृषि वैज्ञानिक संभावित क्षेत्र की पहचान करने में लगे हैं।

इसलिए छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त
हथकरघा और हस्तशिल्प को छत्तीसगढ़ में खूब बढ़ावा मिल रहा है। अनुपात में जैविक और इकोफ्रेंडली क्लाॅथ का चलन भी बढ़ रहा है। यहीं से राह आसान हुई जिरहुल की, जिसकी पत्तियों से प्राकृतिक नील बनाया जाता है। अहम गुण यह कि जिरहुल की खेती मिश्रित फसल के रूप में ही ली जा सकती है। जिसे लेकर अब अपने प्रदेश में भी किसानों का रुझान बढ़ रहा है।

पत्तियों में मिले यह तत्व
आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन और अनुसंधान में जिरहुल की पत्तियों में इंडिकेन नामक ऐसा तत्व मिला है, जिससे प्राकृतिक किण्वन प्रक्रिया के द्वारा प्राकृतिक नीला रंग तैयार किया जाता है। बेहद महत्वपूर्ण यह तत्व इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह रंग जैविक और इको फ्रेंडली क्लॉथ में उपयोग किया जा रहा है। इसी गुण ने इसे खेतों तक पहुंचाने की राह आसान की है।

अनुसंधान में मिले यह तत्व
जिरहुल की पत्तियों में फ्लेवोनाइड्स फिनोलिक यौगिक और इंडिरुबिन जैसे तत्वों की मौजूदगी का खुलासा हुआ है। यह तत्व एंटीऑक्सीडेंट, यकृत को संरक्षण देता है और जीवाणु रोधी बनाता है। इसके अलावा इसमें सूजनरोधी गुणों का होना पाया गया है, जिसकी मदद से छोटे संक्रमण और सूजन को कम किया जा सकता है। त्वचा रोग, दाद और खुजली जैसी समस्याएं भी दूर करता है जिरहुल।

कृषि और पर्यावरण में अहम भूमिका
जिरहुल केवल एक झाड़ीदार पौधा नहीं, बल्कि प्राकृतिक रंग, पारंपरिक औषधि, टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण का सजीव उदाहरण है। आज जब समाज फिर से प्राकृतिक और जैविक विकल्पों की ओर लौट रहा है, तब जिरहुल जैसे पौधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन बिलासपुर
