बिलासपुर। हरी सब्जियां बेतहाशा महंगी। विकल्प बन रहा है ‘खोईला’। रुझान टमाटर में सबसे ज्यादा लेकिन आगे निकलने की होड़ में आगे आ चुका है जिमीकंद, तो भाजी फसलों में ‘चनौरी’ का ‘खोईला’ बनाने की प्रक्रिया बाजार ने चालू कर दी है।
स्वाद बरकरार, कीमत क्रय शक्ति के भीतर। इसलिए सब्जी उपभोक्ता अब न केवल ‘खोईला’ बना रहा है बल्कि भंडारण भी कर रहा है ताकि ऑफ सीजन के दिनों में स्वाद लिया जा सके। यह नया बदलाव सब्ज़ी विक्रेताओं को विक्रय की रणनीतियों में बदलाव के लिए विवश कर रहा है।
‘खोईला’ अब शहर में भी
‘खोईला’ या ‘सुखरी’ का चलन ग्रामीण क्षेत्रों में पीढ़ियों से रहा है लेकिन इसने अब शहरी क्षेत्रों में भी दस्तक दे दी है। वजह सिर्फ एक- ऑफ सीजन के दिनों में सभी प्रकार की सब्जियों के स्वाद की आसान उपलब्धता। इस एक सोच ने खोईला का महत्व ना केवल बढ़ा दिया है बल्कि सीजन के दिनों में आने वाली सब्जियों की मांग में भी लगभग दोगुनी वृद्धि कर दी है।

बदल रहा बाजार
‘ खोईला’ की मांग में आ रहा यह नया बदलाव किराना बाजार को सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहा है। अब यह क्षेत्र भी ‘खोईला’ का भंडारण और विक्रय कर रहा है। इस नए बदलाव ने रोजगार के नए द्वार खोल दिए हैं। अब ग्रामीण क्षेत्रों में ‘खोईला’ बनाने वालों का एक नया वर्ग तैयार हो रहा है जहां से बनी यह सूखी सब्जियां संस्थानों तक पहुंचाई जाएंगी।
आ रहे यह ‘खोईला’
सब्जियों की जिन प्रजातियों की ‘सुखरी’ या ‘खोईला’ ने दस्तक दी हुई है उनमें टमाटर, जिमीकंद, फूलगोभी, मिर्च, सेमी और भिंडी मुख्य है। भाजी फसलों में लाल, पालक, मेथी और चनौरी ऐसी भाजियां हैं, जिनका खोईला’ अब बनाया जाने लगा है। पहली बार इसमें जिमीकंद भी नजर आएगा क्योंकि ग्रीष्म और बारिश के मौसम में इसकी उपलब्धता आसान नहीं होती।

आवश्यक है यह सावधानी
धूप में नहीं छायादार जगहों पर सुखाई गई सब्जी फसलों के ‘खोईला’ में पोषक तत्व बने रहते हैं। सुखाए जाने के बाद छह माह तक इनका सेवन किया जा सकता है।
- डाॅ अमित दीक्षित, डीन, महात्मा गॉंधी उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, सांकरा, दुर्ग।
