नगरीय निकाय रतनपुर


                 बुद्धिसागर सोनी

समय और भाग्य के पूर्व अनायास मिलने वाली उपलब्धि या सफलता अपरिपक्व मस्तिष्क को मदांध कर देता है।  महाविद्यालयीन माहौल से निकलते ही नगर के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर आरुढ़ हो जाना छप्पर फाड़कर मिलने वाली नेमत जैसा था। ऊपर से तुर्रा यह कि दोनों राष्ट्रीय दलों के प्रत्याशियों को पटखनी देकर अध्यक्षीय आसंदी पा जाने से मन: स्थिति “कनक कनक तैं सौ गुनी” वाली हो गई।  दर्पमान ऐसा कि रात दिन अथक परिश्रम कर वोट मांगने वाले अपने समर्थकों से भी सीधे मुंह बात करना युवा अध्यक्ष को नागवार लगने लगा।  मानो सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर लिया हो।  उसके मन में यह बात गांठ कर गया कि उसने विधायक समर्थित प्रत्याशी को हराया है।  लिहाजा शपथ ग्रहण समारोह में विधायक महोदय को अधिकारिक न्यौता देना भी गवारा ना हुआ।  ऐसे में नगर के कांग्रेसी पार्षदों और कार्यकर्ताओं में रोष छा गया। बतकहिया विधायक के कानों तक पहुंची।  विधायक जी कोई साधारण राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले तो थे नहीं, राज्य के कद्दावर नेता थे।  इसी बीच किसी ने यह बात उनके कानों तक पहुंचा दी कि नामांकन फार्म में उम्र संबंधी इंद्राज कूटरचित किया गया है। 
       करेला वह भी नीम चढ़ा। उस जमाने में नेताजी का रुतबा ऐसा था कि भृकुटी भी तन जाये तो आईएएस और आईपीएस अफसरों को पसीना छूट जाये।  बात कान में पहुंचने की देर थी, तत्काल बंगला में आकर भेंट करने का फरमान जारी कर दिया।  फरमान मिलते ही पैरों के नीचे‌ से जमीन खिसकने लगा।  नाफरमानी का मतलब था नेमत से हाथ धोना, हुक्म मानने का तात्पर्य जीत की अकड़ को भूलाकर सिर झुका देना। इधर कुआं उधर खाई।  अब तालाब में रहकर मगरमच्छ से बैर तो रखा नहीं जा सकता।  कुछ वरिष्ठ कांग्रेसियों ने दया दिखाई, सलाह दिया डेलीगेट बनाकर संग चलने का आश्वासन दिया,  तब कहीं जाकर जान हलक से नीचे उतरा।  आनन फानन में तैयारी किया। किसी दोस्त ने कुर्ता पाजामा दिया, किसी ने जवाहिर वास्केट तो किसी ने जूता मोज़ा उपलब्ध कराया।
      डेलीगेट बंगला पहुंचा तो अन्य निकायों के चयनित अध्यक्षों, अधिकारियों और पार्टी कार्यकर्ताओं का हूजूम लगा था।  विधायक में एक खास गुण था, हजारों के समूह में प्रत्येक समर्थक को याद रखते थे। डेलीगेट के हाल में प्रवेश करते ही नगर के एक वरिष्ठ कांग्रेसी को नेताजी ने आवाज दिया, अध्यक्ष महोदय को मेरे पास लाओ भाई।  वरिष्ठ ने समूह में नजर फिराई तो अध्यक्ष महोदय सबसे पीछे सिमटे सिकुड़े अंदाज में खड़े थे।  वरिष्ठ ने समीप बुलाया समझाया जाकर आशीर्वाद लें लो।  अध्यक्ष महोदय बड़ी हिम्मत कर लरजते पांव आगे बढ़े। पैर छूने ही वाले थे कि विधायक महोदय निकट खड़े पुलिस अधिकारी से बोले- अरेस्ट हिम!  पाजामा गीली हुई कि नहीं यह तो पता नहीं लेकिन लरजते पांवों की थिरकन उपस्थित जनसमूह ने महसूस किया।  आखिरकार डेलीगेट बनाकर आये वरिष्ठों ने बात संभाली।  बड़ी मिन्नतों के बाद विधायक जी शांत हुए। आनन फानन में नव निर्वाचित अध्यक्ष को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई गई। तब कहीं जाकर विधायक जी का वरदहस्त सिर पर आया।

गंभीर संकट टलने के बाद कांग्रेसियों को लगा कि अब सबकुछ सामान्य हो जायेगा।  कद के हिसाब से वरिष्ठ और कनिष्ठ को मान सम्मान और परिषदीय क्रियाकलापों में समुचित स्थान मिलेगा।  किंतु पीआईसी के प्रथम बैठक में ही यह सोच दिवास्वप्न साबित हुआ। 
       विधायक के छत्रछाया मिलने बाद अध्यक्ष की निरंकुशता तथा व्यवहार में आक्रामकता का अंदाज झलकने लगा।  हांलांकि युवा अध्यक्ष की विकासवादी सोच का लाभ भी नगर को मिलता नजर आया।  नगर के अधिकांश कच्ची गलियों का कांक्रीटीकरण, पेयजल की व्यवस्था में सुधार के अलावा निकाय के कर्मचारियों के कार्यशैली में बदलाव तथा उनके निरंकुशता पर लगाम कसने लगा।  नगर के अधोसंरचना एवं मूलभूत विकास कार्यों में तेजी आया किन्तु कुछ अदूरदर्शिता पूर्व कार्ययोजनाओं की शुरुआत भी देखने को मिला। मसलन कस्बाई परिवेश वाले नगर में मल्टीस्टोरी शापिंग काम्प्लेक्स का औचित्यहीन निर्माण किया जाना। जो आज भी वीरान और नशेड़ियों का अड्डा बना हुआ है।
       प्रथम चुनाव से लेकर २०१९ के चुनाव तक प्रत्येक चुनाव में उन्होंने सहभागिता निभाई, किसी में पार्षद के रुप में सफलता मिली तो किसी में असफलता।  आसन्न चुनाव में भी उनकी दावेदारी संभावित है। 

क्रमशः जारी 3 ….
                             

लेखक साहित्य सेवक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं आलेख लोक मीमांसा पर आधारित उनके निजी विचार है। इसमें कोई भी संपादकीय हस्तक्षेप नहीं है।