नगरीय निकाय रतनपुर के आम चुनाव विशेष
बुद्धि सागर सोनी
संप्रसंलोग यानि संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य। एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसका संचालन जनता के लिए जनता के द्वारा जनमत के माध्यम से चुने हुए जनप्रतिनिधियों के समूह द्वारा किया जाता है। चुने हुए जनप्रतिनिधि गांव, नगर, प्रदेश एवं देश की दिशा और दशा तय करते हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य को ध्यान में रखते हुए शासन प्रशासन की नीतियां तय करना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। यह जनप्रतिनिधियों के सामूहिक सोच पर निर्भर करता है कि पंचायतीराज व्यवस्था में पंचायत से लेकर लोकसभा की आसंदी पर आसीन सरकार अपने अवाम को अर्श से फर्श तक सबको सभी प्रकार के प्रभुता से संपन्न रखते हुए राष्ट्र को उसके अतीत और भविष्य की अमिट एवं अनंत विकासवादी धरातल प्रदान करें।
संप्रसंलोग की व्याख्या के पश्चात आसन्न नगरीय निकाय चुनाव 2025 में धार्मिक पर्यटन नगरी रतनपुर के बुनियादी विषयों पर विहंगम दृष्टिपात कर लेते हैं। प्रथम बुनियादी बात यह कि रतनपुर कोई आम नगर नहीं है, यह एक खास नगर है जो केन्द्रीय पर्यटन मानचित्र में अपने राजधानीकालीन स्वर्णिम इतिहास और वर्तमान में उसके लक्षित साक्ष्यों के कारण धार्मिक पर्यटन नगरी का रुतबा रखता है। पौराणिक कथाओं, किंवदंतियों तथा जनश्रुतियों को नजरअंदाज कर दें तब भी नगर के चारकोसी में बिखरे खंडहरों, नगर के भीतर विद्यमान गजकिला, आदिशक्ति महामाया मंदिर, बैराग, आठाबीसा के भग्नावशेष, पंच शताधिक शिवालयों की अटूट श्रृंखला, सहस्त्राधिक तालाबों पोखरों की मौजूदगी, इस नगर के राजधानी कालीन गौरवशाली अतीत का मौनसाक्षी है।
नगर के समुन्नत इतिहास के परिपेक्ष्य में वर्तमान की तुलना करें तो पलड़ा पासंग के बराबर भी नहीं बैठता। कहां राजा भोज कहां गंगू तेली। गंगू तेली भी ऐसा कि किसी पनौती से कम नहीं। तेल से भरे तिलहनी दानों से भी तेल की बूंद निकालने में नाकारा।
रतनपुर का लोकतांत्रिक इतिहास नगर के प्राचीन इतिहास के एकदम विपरीत महज ढ़ाई दशक पुराना है। पिछली सदी के अंतिम वर्षों में नगर के नागरिकों को मतदान कर स्थानीय सरकार चुनने का पहली बार अवसर मिला। इसके पूर्व देश की आजादी से लेकर निकाय के प्रथम आम चुनाव तक आठ दस जमूरों के द्वारा चयनित जम्हूरा को सरपंची या फिर अध्यक्षीय आसंदी सौंप दिया जाता था। नगर में पहली बार हुये आम चुनाव के प्रति मतदाताओं में जबरदस्त रुझान देखने को मिला था। आरक्षण की प्रक्रिया में नगर पंचायत की अध्यक्षीय आसंदी अनुसूचित जाति के पाला में गया। इससे बाकी जाति वर्गों में निराशा व्याप्त जरुर हुआ किन्तु पहली बार नगर के लिए मताधिकार करने का उत्साह अधिक संचारित रहा।
चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों बड़ी पार्टियों ने अपने हिसाब से दमदार प्रत्याशीयों को टिकट दिया, किन्तु जनमत की अवधारणा में पार्टीगत प्रत्याशी सटीक नहीं बैठ पाये। मतदाताओं ने दलगत राजनीति से परे हटकर एक नये नवेले, शिक्षित और रतनपुर महाविद्यालय के अध्यक्ष रह चुके युवा पर भरोसा जताते हुए निर्दलीय प्रत्याशी को भारी मतों से जीत दिलाया। यहां उल्लेखनीय है कि इस जनादेश का सर्वाधिक आघात राज्य (मध्यप्रदेश) के विधानसभा अध्यक्ष एवं कोटा विधानसभा क्षेत्र के तत्कालीन विधायक को लगा था। क्योंकि उनके द्वारा समर्थित प्रत्याशी को बड़े मतांतर से हार का सामना करना पड़ा था।
नगर के प्रथम चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी रमेश सूर्या को गिलास छाप में जीत मिला था। तब से लेकर अब तक ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन नगरी में गिलास का जो रुतबा बढ़ा वो नगर के गली मोहल्लों और वार्डों में आज भी छलक रहा है। फ़र्क इतना है कि कांच और धातु के गिलास का स्थान “डिस्पोजल” ने ले लिया है। ….. क्रमशः जारी
लेखक साहित्य सेवक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं आलेख लोक मीमांसा पर आधारित उनके निजी विचार है। इसमें कोई भी संपादकीय हस्तक्षेप नहीं है।
