कमाई पूंजी से मिल गए खुशनसीबों के कंधे
रतनपुर सीएचसी में इलाज नहीं मिलने से मानसिक रोगी की हुई मौत का मामला
रतनपुर। करोना काल की विभीषिका झेल कर बचता बचाता ही तो वो इस शहर तक पहुंचा था। मानसिक रूप से बीमार था, उसे जरुरत थी अपनों के तिमारदारी की। बीते ढाई बरस का अरसे में ऐसा कोई “सिस्टम” उस तक नहीं पहुंचा, जो उसके अपनों से बिछड़ जाने के जख्मों पर फोहे रखता। कोई नाते-रिश्तेदार भी तो पूछ परख करते, शोर लगाते, कोई पहचान, नाम देने, गले लगाने नहीं आएं। अपनों के लिए बोझ रहा होगा ! अच्छा हुआ जो उसे सिस्टम ने मार डाला ? पुलिस, थाना, कोर्ट-कचहरी की किचकिच और सजा से उसके लावारिस होने ने सबको बचा डाला …
मानसिक रूप से बीमार, मंद बुद्धि होने के बाद भी उसने इस शहर में इतना तो कमाया कि खुशनसीबों कंधे भी मिल गए। उसका पार्थिव देह मिट्टी में समा गया। अड़तालीस घंटे लालू का पार्थिव देह मरच्यूरी के कमरे में फ्रीजर पर बंद रहा। नाते-रिश्तेदार, वारिस की खोजबीन करने “सिस्टम” में इतने ही दिन मुअइयन है। इसमें कोई कोताही नहीं बरती गई। जैसे कि उम्मीद थी इन दो दिनों में किसी ने रिश्ते, नातेदार होने की दावेदारी पेश नहीं की। वहीं उसके कमाएं लोग पूछते रहे कि क्या हुआ उसका।

सोमवार को भी मरच्यूरी के बाहर जमा थी उसकी पूंजी। सिस्टम के तंत्र ने पंचनामा कराया। तस्दीक कराई की उपर से सब ठीक-ठाक है। मौके पर उपस्थित डॉक्टर ने शव का पोस्टमार्टम किया। जिसकी रिपोर्ट वे ही बनाएंगे जिनके एप्रान पर उसकी थमती सांसों से निकले खून के छींटें है। रिपोर्ट पर क्या है क्यों है की भी भला अब किसे चिंता होनी है। जो था वो गुजर गया। भूल-चूक देनी की गुंजाइश ही खत्म। वो जीता जागता पहले भी किसी के अपना होने की दावेदारी कर लेने के लायक नहीं था। वो किसी को नहीं जानता था लेकिन कुछ लोग थे जो उसे जानते थे पहचानते थे दिल के रिश्ते से। वहीं रिश्ता उन्हें अस्पताल की दहलीज तक ले गया था। बहुत कोशिश की। ऐसा घट जाने की जरा भी आशंका होती तो गंभीरता से और कोशिश करते जो उनके बस में था। यही दिल का रिश्ता उन्हें मरघट तक भी खींच कर ले गया। सबने अंतिम बार उसको देखा, सब सोचते रहे अब वो कहां से देख रहा होगा। अब भी खुली थी उसकी आंखें, जिसको न जाने था किसका इंतजार ….
