सबने देखी-सुनी, कैसे उनके और कुछ सरकार के चुने वीर बहादुर और वीरांगना किनके इशारे पर क्या बोल रही थीं

लोगों को लगा कि कांग्रेस की सरकार है, इनकी नहीं सुनी जाएगी तो फिर कका राज में किनकी सुनी जाएगी

संगठन की खामोशी बता रही जिला मुख्यालय तक बंटा चूरन

रतनपुर । सरकारी छुट्टी के दिन शनिवार और रविवार को कब्जा दिखाने सरकारी जमीन पर दीवार खड़ी होनी शुरू हो गई। कुछ लोग पहुंचे नूरा कुश्ती करने। लोगों को लगा कि कांग्रेस की सरकार है, इनकी नहीं सुनी जाएगी तो फिर कका राज में किनकी सुनी जाएगी। सुने रहिन तुहर कका जिंदा हे …! और अंततः कांग्रेस भवन की जमीन बची नहीं, बिक गई जमीर … !

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गतांक से आगे की खबर पढ़ने से पहले जंगल के नए नए राजा बने बंदर की कहानी पढ़ ले…. उम्मीद है अच्छा लगेगा….

कहानी ऐसी है। जंगल में शेर के राजा होने की बात सियार, गधा, लोमड़ी और बंदर को अखरती थी। सभी का मानना था कि शेर की दादागिरी आखिर कब तक चलेगी। सब सोच कर लोमड़ी, सियार और उनके साथियों ने फैसला किया किया। चुनाव में शेर को अब राजा नहीं चुना जाएगा। किसी अन्य जंगली जानवर को जंगल का राजा बनाया जाएगा।
       
     अगले दिन सभी जानवरों की सहमति से नये राजा के नाम पर मुहर लग गई। लोमड़ी और सियार दोनों ही बहुत घाघ थे। उन्होंने तय किया कि बंदर सबसे ज्यादा ठीक है। बंदर समझदार और कद का छोटा जानवर है लोमड़ी और सियार पर कोई धौंस नहीं जमा सकेगा। शेर के साथ अन्य जानवरों ने लोमड़ी और सियार के कहने पर बंदर को जंगल का राजा घोषित कर दिया। अब बंदर शान से दरबार में शेर के सिंहासन पर बैठ कर सारे मामले सुनता और फैसले करता। दोषी को सजा भी सुनाता। कुछ दिन तक सब ठीक चलता रहा। लेकिन कुछ दिनों के बाद एक चिड़िया जंगल के राजा बंदर के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंची कि किसी ने उसके घोंसले को तोड़ दिया और अंडों को फोड़ दिया। बंदर ने चिड़िया की शिकायत बड़ी ही गंभीरता से सुनी और दोषी के खिलाफ एक्शन लेने का भरोसा दिया।

दो दिनों के बाद जंगल के अन्य जानवर भी राजा से शिकायत करने पहुंचे। उन सभी ने शिकायत की कि शेर उनके बच्चों को परेशान कर रहा है, उनके बच्चों को मार कर खा रहा है। बंदर ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना और पेड़ की एक डाली से दूसरी डाली पर उछलने कूदने लगा। काफी देर तक वो ऐसा करता रहा।  जिसे देखकर जानवर अपनी शिकायत भूलकर वहां से चले जाते। कुछ दिनों बाद राजा बंदर के पास लोमड़ी ने  आकर कहा महाराज गजब हो गया। कल रात उनके घर पर शेर आया और उसने मेरे दो बच्चों को खा लिया। महाराज कुछ कीजिये। शेर का उत्पात बढ़ता ही जा रहा है। आये दिन किसी न किसी जानवर के बच्चों को शिकार बना रहा है। उसे सजा मिलनी ही चाहिये। लोमड़ी की बात सुन कर बंदर एक बार फिर पेड़ की डालियों पर उछल कूद करने लगा। कुछ देर बाद बंदर अपने सिंहासन पर आ कर बैठ गया। लोमड़ी को देखते हुए कहा बहन लोमड़ी शेर ने तुम्हारे बच्चे को मार कर खा लिया मुझे इसका बहुत अफसोस है। तुमने देखा कि मेरा पूरा प्रयास है कि जंगल में कोई जानवर किसी को नुकसान न पहुंचाये। मेरे प्रयासों में कोई कमी हो तो बताएं। अब  आप अपना देख लो।

अब आप समझ ही गए होंगे हैं न…! फिलहाल आगे पढ़े महामाया चौक रतनपुर स्थित करोड़ों की सरकारी खाली आबादी जमीन के मामले पर तहसीलदार  रतनपुर ने 27 अप्रैल 2022 को आदेश पारित कर पूर्व में अपने द्वारा जारी स्थगन आदेश को निरस्त कर दिया गया. इसकी भनक कांग्रेस के चौकीदार दावेदारों को नहीं लगी. वहीं तीन महीने बाद  30 जून को जमीन पर कब्जा करने दीवार उठाने काम शुरू हुआ तो तस्वीर बदल चुकी थी अब “बाड़ मेड़ को खाने पर जुटा था” चौकीदार लुटेरा बन चुका था. पूरी कहानी बंदर के राजा बनने जैसी हो गई थी. सुनियोजित तरीके से सरकारी अवकाश के दिन शनिवार को दिनरात मेहनत करके कब्जे की दीवार खड़ी कर दी जाती है. कुछ कांग्रेसी पहुंचे विरोध करने, इनको तहसील कार्यालय से पारित बिकी जमीर की तहरीर की परची दिखा दी गई. दरी उठाने वालों की तो जमीन ही खिसक गई थी. खिसियाने लगे, बोले ये कैसे हो गया. सब समझ गए कि पैसा बोलता है… सब देख रहे थे कि कुछ पैसे के बल पर उनके चुने और कुछ सरकार के चुने वीर बहादुर और वीरांगना बोल रही थीं.

3 अगस्त को फिर खूब उछल कूद होता है, किराये के लोग दीवार की रखवाली करने पहुंचते है. तहसीलदार के साथ राजस्व अमला भी पैदाइश करने दस्तावेज लेकर पहुंचते है. पटवारी के चालू नक्शे के प्रतीक चिन्ह देखकर चौकते है, कहते हैं घास जमीन आबादी कैसे हो गई… अब आम लोगों की समझ इतनी है जमीन तो जमीन  है,  जिसमें सपनों के घर बनते हैं, पेट भरने अन्न उगते हैं, हां पर अब कुछ बेगैरत लोग धन भी उगाने लगे हैं….. क्रमशः पढते रहिये
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करेंगे तहसीलदार के फैसले का खुलासा….