वरिष्ठ पत्रकार नथमल शर्मा

बुनियादी सवालों से इतर इस बार फिर भरमा देने वाली बातों में युवाओं को उलझा दिया गया है । राजनीति की आंच पर तप रहे ये युवा इस बार ,यानी एक बार और काले व भगवा में उलझ कर रह गए हैं । और यह सब शुरू हुआ देश के सबसे उन्नत प्रदेश से ।
कर्नाटक और खासकर बैंगलोर (अब बंगलुरु ) ने देश के आई टी हब के रूप में अपनी जगह बना चुका है । दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के ऑफिस वहीं है । और यह शहर देश के युवाओं की पहली पसंद भी है क्योंकि यहां रोजगार के बेहतर अवसर है तो यहां प्रकृति भी मेहरबान रहती है । बेहद खुशनुमा मौसम और माहौल । यही नही कर्नाटक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी काफ़ी समृद्ध है । शानदार इतिहास संजोए और युवाओं के भविष्य को संवारते इस प्रदेश को भी अब बर्बर मध्य युग की तरफ़ ले जाने की कोशिश की जा रही है । परंपरा के नाम पर खाने,पीने,पहनने,ओढ़ने और रंगों, भाषाओं की राजनीति करने वाले लोगों की नज़र इस प्रदेश पर भी जैसे लग गई है । और इस बार तो घृणित राजनीति शिक्षा परिसरों में घुस गई है ।
कर्नाटक में पिछले कुछ दिनों से ये आग लगी हुई है । शिक्षा परिसरों को साम्प्रदायिक राजनीति से गंदा किया जा रहा है । हिजाब को लेकर यह विवाद शुरू किया गया और अब इसे हिजाब और भगवा गमछे में बदल दिया गया है । उडुपी जिले के कुंडापुर कालेज में एक दिन अचानक फरमान जारी हुआ कि छात्राएं हिजाब पहन कर कक्षा में नहीं बैठ सकती । उस दिन हिजाब पहन कर आई तेईस छात्राओं को उनकी कक्षाओं में जाने से रोक दिया गया । प्राचार्य ने भी कोई समाधान नहीं निकाला ,बल्कि कहा कि ऊपर के आदेश हैं । फ़िर पता चला कि ऊपर यानी विधायक के आदेश हैं । महाविद्यालय शिक्षण विकास समिति के अध्यक्ष के नाते विधायक महोदय ने इस तरह का फरमान जारी करने कहा । परेशान छात्राओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की जिस पर सुनवाई जारी है ।
इसके बावजूद विवाद थमने के बजाय बढ़ते ही जा रहा है । ऐसा नहीं है कि इन छात्राओं ने पहली बार हिजाब पहना हो ,लेकिन अब अचानक उन पर रोक लगाई जा रही । यहां तक कि हिजाब पहन कर आने वाली छात्राओं को परेशान किया जा रहा है । युवकों का झुंड भगवा गमछा ओढ़े इन छात्राओं का विरोध कर रहा है । कल तो हद हो गई जब एक छात्रा को कई युवाओं ने घेर लिया । सब भगवा गमछा धारण किए हुए थे । हालांकि छात्रा ने भी हिम्मत दिखाई और उनका सामना करते हुए क्लास की तरफ़ बढ़ ली । इस बीच जय श्री राम के उन्मादी नारे लगाते रहे वे लोग तो छात्रा ने भी तेज आवाज़ में अल्लाह अकबर कहते हुए विरोध किया ।
जिन शिक्षा परिसरों में पढ़ाई, खेल कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम होने चाहिए । जहां किताबों से भरी लाइब्रेरी होनी चाहिए । हर स्कूल, कालेज की अपनी डिजिटल लाइब्रेरी और समुनन्त लैब होने चाहिए । जहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मंच और माहौल होना चाहिए, जहां लगातार शैक्षणिक और विज्ञान सम्मत सेमिनार, कार्यशालाएं होनी चाहिए और उच्च स्तर के शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान और विकास पर गंभीर बात होनी चाहिए । पर ऐसा कुछ नहीं है । स्कूलों की शिक्षा बेहद महंगी है तो उच्च शिक्षा के मामले में दुनिया में हम कहीं नहीं टिकते । दुनिया के टाॅप दो सौ विश्वविद्यालयों की सूची में हिंदुस्तान का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है । विश्व गुरु का सपना दिखाने वाली सियासत के लिए ये सब जरूरी नहीं उसे तो इन मासूम छात्र छात्राओं को राजनीति की भट्टी में पिघला देना है जिससे सिर्फ एक रंग ही बने ।
सोचा जाना चाहिए कि नफ़रत का ये माहौल क्यों बनाया जा रहा है । कभी गाय तो कभी मंदिर तो कभी धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले युवाओं को कुछ वक्त तक भरमाने में कामयाब भी फिलहाल हो गए हैं । अब हिजाब भी एक बहाना हो गया है । नफ़रत की यह आग वहां से महाराष्ट्र तक भी पहुँच गई है । मालेगाँव में हिजाब के समर्थन में जुलूस निकाला गया । हर बात को चुनावी नजरिये से देखने की राजनीति करने वालों ने इस बार छात्र छात्राओं को लपेटने की कोशिश की है । वह भी पहनने के नाम पर ।
आखिर हिजाब को मज़हब से क्यों जोड़ा जाना चाहिए । यह तो कभी धूप और गर्मी से बचने के लिए इस्तेमाल हुआ करता था । तेरहवीं शताब्दी में लिखे गए एसिरियल लेख में इस बात का ज़िक्र है कि मेसोपोटामिया के लोग तेज धूप और हवा से बचने के लिए सिर पर कपड़ा बांधते थे जिसे हिजाब कहा जाता था । एक लेखक फेगोल शिराजी ने लिखा है कि सऊदी अरब में सिर ढंकने का चलन बहुत पहले से ही था । इसका कारण वहां की गरम जलवायु रही । बाद में इसे धर्म से जोड़ दिया गया । बच्चियों और विधवाओं के लिए अनिवार्य कर दिया गया । पता नहीं था चली आ रही एक परंपरा इस तरह घृणित राजनीति में इस्तेमाल होने लगेगी । हमारा देश संविधान के अनुसार चलता है । संविधान का अनुच्छेद 25 (1) अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धर्म मानने, प्रचार करने के स्वतंत्र रूप से अधिकार की गारंटी देता है । अब इस अनुच्छेद के परिप्रेक्ष्य में जरा कर्नाटक के मामले को देखने की कोशिश करें । अगर सिख धर्म के अनुयायी अपने धार्मिक प्रतीक चिन्हों को धारण करके सार्वजनिक रूप से रहते और सहज स्वीकार भी किए जाते हैं, अगर एक मुख्य मंत्री सन्यासी के रूप धारण किये हुए अपने दायित्व निर्वहन कर रहा है और किसी को भी वह असहज़ नही लग रहा है (लगना भी नहीं चाहिए ) तो फ़िर ये सारी सियासत हिजाब पर ही क्यों ? यह उनका अपना निर्णय होना चाहिए कि हिजाब पहने या न पहनें । हां यह है कि धार्मिक प्रतीकों को लेकर सभी धर्मों के लोगों को सोचना होगा कि कितनी ढिलाई रखे या कितनी कड़ाई । लेकिन छात्राओं को इस तरह राजनीति का शिकार बनाना कतई उचित नहीं । अब कल मालेगाँव में विरोध प्रदर्शन के दौरान यह भी बात आई कि जब तिलक लगा कर , सिंदूर लगा मंगल सूत्र पहन कर शिक्षा संस्थानों में अन्य धर्म के लोग जा सकते हैं तो हिजाब पर ही आपत्ति क्यों ? देखिए नफ़रत की राजनीति किस रूप में ढाल रही है समाज को । ये ठीक है कि इससे लोग पानी,रोटी,घर,रोजगार,खेती किसानी जैसे बुनियादी सवालों पर बात नहीं करते और राजनीतिक लोगों के लिए खास कर साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों के लिए तो यह सबसे माकूल है । इसीलिए यह हो रहा है , बढ़ रहा है । हमारा हिंदुस्तान विविधताओं का देश है और यही इसकी खूबसूरती भी है और ताकत भीसलिए सत्ता पाने या उसे बचाए रखने की साज़िश करने वालों के मंसूबे समझने की जरूरत है । हमारे युवा किसी भी राजनैतिक दल के ‘इस्तेमाल’ की चीज़ कतई न बनें ये कोशिश करनी होगी ।


साभार इवनिंग टाइम्स सांध्य दैनिक बिलासपुर छत्तीसगढ़ संस्करण