इस बरस से हमारे सैनिक नहीं कहेंगे "अबाइड विथ मी " या प्रभु पास रहो तुम मेरे। गणतंत्र दिवस के समापन समारोह में बरसों से बजाई जा रही यह प्रार्थना धुन इस बरस से हटा दी गई है। कारण तो पता नहीं है , लेकिन जो सूची जारी की गई है उसमें इसका उल्लेख नहीं है। दो बरस पहले भी ऐसा किया गया था लेकिन बात फैल गई और बहुत आलोचना हुई। महात्मा गांधी की इस प्रिय धुन को उस समय फिर से शामिल कर लिया गया। लेकिन इस बरस हटा ही दिया। गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत 24 जनवरी से राजपथ पर होती है। 26 जनवरी को मुख्य समारोह होता है । समापन 29 जनवरी को होता है। 29 जनवरी की शाम को विजय चौक पर बीटिंग रिट्रिट समारोह होता है। तीनों सेना के पारंपरिक बैंड और पाइप देशभक्ति की अनेक धुनें बजाते है और और देश के लिए शहीद हुए हमारे जांबाज जवानों को याद करते हैं। राष्ट्रपति से समारोह समाप्ति की अनुमति लेकर अपने-अपने स्थान पर वापस जाते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत से ही यह परंपरा चली आ रही है। इस रिट्रिट समारोह की आखिरी धुन 'अबाइड विथ मी ' होती है। इस बार इसे हटा दियागया है। इस बार समारोह का समापन 'सारे जहां से अच्छा ' की धुन के साथ होगा। इसके अलावा 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'हिंद की सेना ', 'जय भारती', 'कदम कदम बढ़ाए जा', 'फैनफेयर बाय बगलर्स', 'ड्रमर्स काॅल', 'केशरिया', भी उन 26 धुनों का हिस्सा है जिसे बजाया जाएगा। बस सिर्फ एक धुन को ही हटाया गया है। यह सरकार बहुत कुछ बदल रही है। नाम बदलने से लेकर रंगों तक को बदला जा रहा है। स्कूल, कालेज के पाठ्यक्रमों में जोड़ा - घटाया जा रहा है। अमर जवान ज्योति को बुझाया जा रहा है (नई ज्योति में समाहित) तो नए नायक बनाए और बताए जा रहे हैं। सरकारें ऐसा करती है। कर भी रही है। लगभग हर सरकार बंदूक से नहीं विचार से डरती है ।और आम आदमी की भलाई के विचार तकलीफ़ देते हैं। खास कर तब तो और भी ज्यादा जब उसमें आज़ादी के आंदोलन के नायकों का ताप दिखता हो, आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टि दिखती हो। इसलिए यह सब बदल दिया जाना ही सत्ता को सुहाता है। लेकिन 'अबाइड विथ मी' को क्यों हटा दिया गया? उसे तो नेहरू ने लिखा नहीं था। हां, गांधी की का प्रिय भजन था। साबरमती आश्रम में 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' और 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' के साथ ही 'अबाइड विथ मी' भी रोजाना गाया जाता था। गांधी की हत्या भले ही चरम हिंदू विचार से उपजी थी लेकिन चूंकि गांधी एक विचार के रूप में पूरी दुनिया में ज़िंदा है इसलिए किसी दल में राजनीतिक रूप से साहस नहीं है कि गांधी को नकार सके। संघ पोषित इस सरकार में भी नहीं। ये बात अलग है कि गांधी की हत्या को जायज़ ठहराने वाले संसद में हैं। हमारे प्रधानमंत्री जिनके लिए कह चुके हैं दिल से कभी माफ़ नहीं करेंगे । दिल में रखे हुए भी हैं और दिल से माफ़ भी नहीं करते। यह राजनीति में ही संभव है। गांधी के इस प्रिय भजन में ऐसा क्या है कि उसे हटाना पड़ा । कुछ भी तो नहीं। यह प्रभु से की गई प्रार्थना है। जिसकी पंक्तियाँ इस तरह है -

पास रहो तुम मेरे,
प्रभु पास रहो तुम मेरे
जब शाम घिरी आती हो,
गहराते हो अंधेरे
प्रभु पास रहो तुम मेरे
जब साथी सब सो जाएं
सारे सुकून खो जाएं
आश्रयहीनों के आश्रय
प्रभु पास रहो तुम मेरे
जीवन का नन्हा-सा दिन यूं बीता जैसे पल-छिन
बीती धरती की खुशियां सब रंग राग रागिनियाँ
ऋतुओं की सुंदर छवियाँ लो ख़त्म हुई इक दुनिया
हाँ तुम न कभी रीतोगे बस पास रहो तुम मेरे
मुझको दुश्मन का डर क्या
जब पास तुम्हारी छाया
दुख में अब है क्या रक्खा आँसू भी लगता मीठा
जब यम का पाहुन आया हंस उसको गले लगाया
वो हार गया मैं जीता गर पास रहो तुम मेरे
मुंदने दो मेरी आँखें प्यारा सलीब रख आगे
हंसती उदासियाँ जागें मैं जाऊं साथ हवा के
जन्नत की सुबहें फूटें पृथ्वी की रातें छूटें
जीवन में और मरण में हरि पास रहो तुम मेरे
हाँ पास रहो तुम मेरे
प्रभु पास रहो तुम मेरे ।


यह एक इसाई प्रार्थना है । और हो सकता है यही एक कारण हो कि इसे हटा दिया गया। इसे स्कॉटिश कवि और पादरी हेनरी फ्रांसिस ने लिखा था । चर्च के एक संगीतकार विलियम मोंक ने इसे गाया था और इसकी धुन भी बनाई थी। तीन सौ बरस पुरानी बात है यह । सत्रहवीं सदी में किंग जेम्स द्वितीय ने जंग ख़त्म होने के बाद अपने सैनिकों को परेड का आयोजन करने और और ड्रम बजाने का आदेश दिया था। अनेक अवसरों पर भी लोग इसे गाते , बजाते रहे हैं। 1950 से यह धुन हमारे वीर सैनिकों को याद करते हुए समारोह के आखिरी में बजाई जाती रही है । गांधी की यह प्रिय धुन अब बंद कर दी गई है । अपना देश बदल रहा है। संगीत के सुर भी बदलेंगे । बहुत कुछ बदलेगा। समाज इस बदलाव को चुपचाप देखते हुए अपने ड्राइंग रूम में चैनल बदल रहा है।
– नथमल शर्मा

साभार लोकप्रिय सांध्य दैनिक इवनिंग टाइम्स