एक और गणतंत्र दिवस आ गया । आज़ादी और अपना संविधान लागू करने का स्वर्णिम दिन । दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र का नागरिक होने का गर्व करने का दिन । अपने तिरंगे को शान से लहराते देख कर खुशी से भर जाने का दिन ।
सचमुच इतनी सारी खुशियाँ लेकर आता है हमारा गणतंत्र दिवस । तीनों रंगों में अपने देश को मुस्कुराते , आगे बढ़ते देखने का सुकून । आज़ाद हिंदुस्तान में सांस लेने का सुख । ध्यान दें तो कितनी ही खुशियाँ बिखरी हुई है इस महान दिवस पर । इस दिन एक दिन के लिए ही सही देशभक्ति के गीत गूंजते हैं सब तरफ़ । कुछ घंटे के लिए ही सही आज़ादी के मतवालों की , शहीदों की , उनकी कुर्बानियों की बात भी होती है । देश के हर हिस्से में जश्न का माहौल होता है । हमारा राष्ट्रीय पर्व जो है । पुलिस मैदानों में समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की छटा ही कुछ और । बस ये है कि अब इनमें आम लोग शामिल नहीं होते । सरकारी नौकरी कर रहे अधिकारी, कर्मचारी ड्यूटी निभा रहे होते हैं तो स्कूली बच्चे अपने टीचर्स के कराए अभ्यास को दोहरा रहे होते हैं । बाकी सब रोज की तरह अपने- अपने काम में लगे होते हैं । स्वांत: सुखाय के लिए बनी समाज सेवी संस्थाएं कुछ आयोजन करा लेती है जिसकी तस्वीरें अगले दिन अखबारों में छप जाएगी । गांव- गांव, शहर-शहर राष्ट्रीय पर्व मना लिया जाता है । समाज अपनी लय पर चलते रहता है। जिन करोडों घरों में रोटी के लिए जद्दोजहद होती है वह इस दिन भी होती ही है । बरसों से मज़दूरी कर रहे लोग आज भी वही कर रहे हैं । गावों में दूर तक दुख पसरा है । शहर की चकाचौंध देख कर लोग गावों से शहर आ रहे हैं। हर गांव शहर हो जाना चाहता है तो शहर है कि अपने ही बोझ तले दबते जा रहा है ।

हर शहर के आस-पास झुग्गी झोपड़ियां बढ़ ही रही है । खेती -किसानी वाले देश में अब किसानी से पेट नहीं भरता । अपने ही खेत में मजदूर बने लोग किसी तरह दो वक्त की रोटी कमा पा रहे हैं । किसानों की चिंता में नेता और सरकारें गाल बजा रही है । किसान अपने ही दुख में जकड़े जा रहा है । उसका दुख दूर करना किसी का उद्देश्य नहीं रहा अब । उसके दुख की ज्यादा से ज्यादा बात करके वोट बटोरता लेना ही ध्येय होकर रह गया है ।
गणतंत्र दिवस पर जरा सा समय निकाल कर चारों तरफ़ नज़र तो दौड़ाइये । आज़ादी के आंदोलन का वह ताप तो कब से बिला गया । राजनीति में अब न सिद्धांत रहे, न सेवा भाव । नया और सबसे मुनाफ़े का व्यापार ही तो होकर रह गई है राजनीति । इसमें सब रमे हुए हैं । सामाजिक मूल्यों के ह्रास ने इस तरह की व्यावसायिक राजनीति को ऊर्जा ही दी है । अब अपराधियों की जेल में रहते चुनाव में जीत हो रही है । चुप समाज न जाने कब से अलग अलग-अलग वर्गों में बंट गया है । अब हम किसी नागरिक की तरह नहीं रहते बल्कि दलीय निष्ठा के साथ रहने लग गए हैं । मजे की बात कि हर राजनीतिक दल देशभक्ति को अपनाता है और हर दल में भ्रष्टाचारी, बलात्कारी, हत्यारे आराम से जगह बना लेते हैं । इनमें से कुछ हमारे जनप्रतिनिधि भी बन जाते हैं । परदे के पीछे का लिहाज़ कब का खत्म हो चुका । पहले हर नेता के पास दो चार बाहुबली हुआ करते थे, जिन्हें वह सार्वजनिक रूप से अपने साथ नहीं रखता था । अब बाहुबली ही नेता हो गए हैं । बेहद महंगे हो चुके चुनाव में आम आदमी के लड़ने की सोचना ही बेकार हो गया है ।
‘इस तरह’ की राजनीति को संचालित, नियंत्रित करता है कार्पोरेट । यह सबसे ताकतवर हो गया है । कार्पोरेट यानी व्यापार । और व्यापार यानी मुनाफ़ा । चाहे जैसे भी आए लाभ कमाना ही है । जाहिर है कि इस पूरे परिदृश्य में गरीब कहीं नहीं है, आम आदमी कहीं नहीं है । यानी वास्तविक गण कहीं नहीं है । सिर्फ तंत्र हावी हो गया है । राजनेता-ब्यूरोक्रेट-व्यवसायी की त्रयी ने सबकुछ जकड़ रखा है ।

दुखद यह कि आज़ादी की लड़ाई में जिस तरह प्रेस या पत्रकारों ने आवाज़ उठाई थी वह तो अब कहीं है ही नहीं । पत्रकार से मीडिया कर्मी बने क़लमकार अब कसीदे ही पढ़ रहे हैं । राजनीति के लिए सबसे अच्छे दिन । जब चारण भाटों की जमात बढ़ते ही रही है । चुप समाज की निर्मिति ने सवाल पूछने बंद कर दिए हों । खाया पिया अघाया मध्य वर्ग आज़ादी के इस महान पर्व पर भी घर में सोफे पर आराम से पसरे चैनल बदल रहा हो । उसे अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में गरीब बढ़ते ही जा रहे हैं। दस प्रतिशत धनाढ्यों की तिजोरी में देश की नब्बे प्रतिशत दौलत पहुंच गई है । इस भयावह असमानता का अब उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उसकी संवेदनाएं रिमोट के बटन दबाती उंगलियों में सिमट कर रह गई है । दूर सात समंदर पार खुश है कार्पोरेट कि ऐसे गुलामों पर राज जम गया है । गण पर हावी है तंत्र । हमारा तिरंगा लहरा रहा है शान से । संघर्षशील नागरिकों और चुप समाज को भी गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं ।
नथमल शर्मा

साभार लोकप्रिय दैनिक इवनिंग टाइम्स में प्रकाशित संपादकीय