प्रारंभिक अनुसंधान में हुआ खुलासा

बिलासपुर। असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक, सोनपत्ती का पेड़ किसानों के लिए वरदान बनने जा रहा है। यह खुलासा इस पर हुए प्रारंभिक अनुसंधान में हुआ है। इस सफलता के बाद अब किसान, कृषि विपत्ति का सामना करने की तैयारी कर सकेंगे।

साल में केवल एक बार विजयादशमी पर याद की जाने वाली सोनपत्ती, इस वर्ष किसानों के लिए कई मामलों में खास बनने जा रही है क्योंकि सोनपत्ती देने वाला कचनार का पेड़, न केवल भूमिगत जल भंडार को सुरक्षित रखने में सक्षम पाया गया है बल्कि यह सूखे का संकेत काफी पहले दे देता है। कचनार के पेड़ों का यह संकेत निश्चित ही किसानों के लिए वरदान है।


देता है सूखा का संदेश

कचनार के पेड़ की प्रवृत्ति सूखे दिनों में हरी भरी पत्तियां देने की है, लेकिन जिस बरस पत्तियों की संख्या ज्यादा नजर आए वह कृषि विपत्ति का सामना का संकेत है। अनुपात में इसके फूलों की संख्या का अधिक होना भी दूसरा प्रतीक माना जा रहा है। यह संकेत देखकर किसान, समय रहते प्रबंधन की दिशा तय कर सकेंगे।


बढ़ाता है जल भंडार

कचनार के पेड़ की जड़ें काफी गहराई तक जाने वाली पाई गईं हैं। इसकी वजह से यह अपने आसपास जल भंडार को बढ़ाने में सहायक पाया गया है। घनी शाखा और चौड़ी पत्तियों के दम पर, यह तेज हवा से फसलों को हवा का दबाव सहने की क्षमता भी देता है। इस तरह किसान न केवल भरपूर उत्पादन प्राप्त कर सकेंगे बल्कि तेज हवा से फसल के गिरने से होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा।


यह है मान्यता

मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण के पहले इसी वृक्ष की पूजा और विजय की कामना की थी। द्वापर में महाभारत युद्ध के पहले पांडवों ने इसी वृक्ष में अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाए थे। पुरातन काल से ही चली आ रही इस परंपरा के बाद इसकी पत्तियों को विजय और समृद्धि का प्रतीक माना गया, जो आज भी माना जा रहा है।


होते हैं औषधीय गुण भी

कचनार के पेड़ों की जड़ गहराई तक जाने की वजह से यह भू- जल संरक्षण में प्रभावी भूमिका अदा करती हैं। इसके अलावा प्रकृति विपत्ति का संकेत भी यह वृक्ष देते हैं। औषधीय गुणों से भरपूर कचनार की पत्तियां और फूलों का सेवन सब्जी और रायता के रूप में किया जा सकता है। सेवन के पहले चिकित्सकीय परामर्श का लिया जाना आवश्यक होगा।

  • डॉ अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री,टी सी बी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर