सूखे दिनों में हरा चारा की समस्या होगी दूर
बिलासपुर। धूप में घनी छांव और भूख लगने पर मवेशियों को भरपूर हरा चारा देने वाला “शमी” अब छत्तीसगढ़ में भी अपनी जगह बना रहा है। 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खुद को सक्षम बनाए रखने वाला यह वृक्ष, पौधे के रूप में निजी क्षेत्र की नर्सरियों से होता हुआ घरों तक पहुंचने लगा है।
7 राज्यों में मजबूत जगह बनाने के बाद शमी के लिए छत्तीसगढ़ सहज ही आठवां ऐसा राज्य बन रहा है, जहां का मैदानी क्षेत्र काफी बड़े भू-भाग में फैला हुआ है। साथ ही मवेशी पालन की ओर बढ़ता रुझान, हरा चारा के लिए भरपूर अवसर दे रहा है। लिहाजा निजी क्षेत्र की नर्सरियां, राजस्थान और गुजरात की नर्सरियों से इसके पौधे छत्तीसगढ़ में उपलब्ध करवा रहीं हैं।
जानिए शमी को
खेजड़ी प्रजाति के इस पेड़ को वानिकी विज्ञानियों के बीच प्रोसोपिस सिनेरेरिया के नाम से जाना जाता है। 50 से 400 मिली मीटर बारिश वाले क्षेत्रों में भी तैयार हो जाने वाला शमी का वृक्ष 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खुद को बचा लेता है। दिलचस्प प्रकृति वाला शमी का वृक्ष सूखे दिनों में न केवल घनी छांव देता है बल्कि इसकी हरी-भरी पत्तियां भूखे मवेशियों को भरपूर हरा चारा भी उपलब्ध करवातीं हैं।
फूल और फल से सब्जी
शमी की पत्तियों और फूल-फल से सब्जियां बनाई जाती है। सांगरी के नाम से यह सब्जी, राजस्थान और गुजरात में पहचानी जाती है। तने से फर्नीचर बनाई जा सकती है तो भरपूर ईंधन देने वाला कोयला भी तैयार किया जा सकता है। मतलब साफ है कि यह वृक्ष लगभग सभी प्रकार की घरेलू जरूरतें पूरी करने में सक्षम है।
करता है नत्रजन स्थिर
जिस जगह पर इसके पेड़ लगे होते हैं, उसके आसपास की मिट्टी में नाइट्रोजन को स्थिर रखने में भी इसे सक्षम पाया गया है। प्रारंभिक अनुसंधान में यह खुलासा भी हुआ है कि अपने आसपास के भू-भाग में ली जाने वाली फसल की उत्पादन क्षमता भी बढ़ाता है। इसलिए इसे खेतिहर भूमि में रोपण की योजना, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्य में लागू है।
छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ा कदम
मरुस्थल का राजा, शमी, जांट, और जांटी के नाम से पहचाना जाने वाला शमी का पेड़ राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के बाद छत्तीसगढ़ में पहुंच चुका है। निजी क्षेत्र की नर्सरियों में इसके पौधों की उपलब्धता भी होने लगी है क्योंकि इसे बहुपयोगी गुणों वाला माना जा रहा है।
पत्तियों का है धार्मिक महत्व
शमी के पेड़ और पत्तियों को पुरातन काल से धार्मिक महत्ता मिली हुई है। द्वापर युग में समृद्धि और विजय का प्रतीक मानी गई,शमी की पत्तियों को पूजन में अर्पण करने की अपनी अलग ही महत्ता है। जिसका पालन आज भी किया जा रहा है।
पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण
धार्मिक ही नहीं पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी शमी का वृक्ष विशेष महत्व रखता है। इसमें सूखा सहने की विलक्षण क्षमता होती है। इस वृक्ष से प्राप्त होने वाली फल्लियां, हरी तथा सूखी दोनों अवस्था में सब्जी बनाने के काम आतीं हैं। इसकी लकड़ी का उपयोग घरों में तथा विभिन्न प्रकार के कृषि उपकरण बनाने में होता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का भी कार्य करता है।
- डॉ अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री,बी टी सी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर




