नगदी फसल में तेजी से बना रही जगह

बिलासपुर। बदलता समय, बदलती जरूरतों के बीच नए विकल्प की तलाश कर रहे किसानों के लिए अच्छी खबर। कीजिए कलौंजी की खेती, पाएं बंपर उत्पादन और बंपर मुनाफा। 140 से 160 दिन में तैयार होने वाली कलौंजी की खेती निःसंदेह किसानों की उम्मीद पर खरा उतरेगी। मालूम हो कि इसकी फसल रबी सत्र में ली जाती है।

कृषि को अपार संभावना वाला क्षेत्र माना जाता है। प्रयोग के अनेक अवसर हैं। यही वजह है कि किसान हमेशा विकल्प की तलाश में रहता है। ऐसे किसानों के लिए नकदी फसल के रूप में कलौंजी खुशखबरी लेकर आई है। रबी सत्र में ली जाने वाली कलौंजी की फसल में मिट्टी का गुण, धर्म बेहद अहम है। लिहाजा किसानों को खेती से पहले मिट्टी का परीक्षण करवाना जरूरी होगा। देखना होगा कि कार्बनिक पदार्थ और उर्वरा शक्ति कलौंजी की मांग को पूरा करते हैं या नहीं ?


जाने कलौंजी को

कलौंजी की खेती अब अपने राज्य में भी की जाने लगी है। औषधीय गुणों से भरपूर यह किसानों की अतिरिक्त आय का साधन बन रही है लेकिन फिलहाल इसकी खेती वैसा रूप नहीं ले पाई है जैसा महाराष्ट्र में देखा जा रहा है। पूरे साल मांग में बनी रहने वाली कलौंजी, बीच के कुछ माह में उफान पर रहती है। इस दौरान बंपर कीमत मिलती है। इसलिए यह कलौंजी, अतिरिक्त आय का जरिया बन सकती हैं।


यह है बाजार

प्याज के बीज और करायत के दाने से मिलती-जुलती कलौंजी के दाने के खरीददार, मसाला बनाने वाली इकाइयां तो हैं हीं, साथ ही बिस्किट उत्पादन करने वाली कंपनियां भी बड़े खरीददार हैं। अचार बनाने वाली कंपनियां भी इसकी खरीदी करतीं हैं। ऐसे में बढ़ता बाजार के बीच कलौंजी को अच्छी कीमत मिल रही है।


ऐसे करें खेती

कलौंजी की खेती के पहले किसान मिट्टी का परीक्षण अवश्य करवाएं। कार्बनिक पदार्थ और उर्वरा शक्ति कम मिलने पर गोबर की खाद डालें। समतल भूमि और मानक तापमान पर यह अच्छा परिणाम देती है। कलौंजी की फसल ऐसे किसानों के लिए वरदान बन सकती है जो फसल परिवर्तन और नए विकल्प की तलाश करते रहते हैं।


यह हैं बेहतरीन प्रजातियां

कई प्रजातियों में आने वाली कलौंजी में आजाद कृष्णा की उत्पादन क्षमता 10 से 12 क्विंटल होती है। एन-एस-32 की उत्पादन क्षमता 10 से 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर मिली है। यह प्रजाति 140 से 150 दिन में तैयार हो जाती है। एन-एस-4 सबसे ज्यादा उपयोग में लाई जाने वाली प्रजाति है। 150 से 160 दिन में तैयार होने वाली यह प्रजाति 50 क्विंटल उत्पादन देने में सक्षम है।

कलौंजी का उपयोग मुख्यतः मसालों में किया जाता है। रायगढ़ में इसकी खेती सफल रही है। छत्तीसगढ़ में व्यावसायिक खेती की संभावनाएं प्रबल हैं।

  • डॉ जितेंद्र सिंह, प्रोफेसर एंड हेड, वेजिटेबल साइंस, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर