उधर झोला वालों की सिलिंग, इधर अस्पताल में तालाबंदी

डॉक्टर और स्वास्थ्य अमला नदारद, कार्रवाई नहीं 

बिलासपुर। उधर छत्तीसगढ़ शासन और सरकार दावां करते थक नहीं रही थी कि राज्य में मलेरिया पाज़िविटी दर 4.60 से घटकर 0.51 फीसदी पर आ गई है। इधर कोटा ब्लॉक के संवेदनशील माने जाने वाले वनांचल के दो गांवों में कथित रूप से चार मासूमों की मौत हो गई। हालांकि प्रशासन इसे अधिकारिक रुप से इसे स्वीकार भी नहीं रही है। दो मौत पर तो कारण जानने पोस्ट मार्टम भी करा लिए गए हैं। इन मौतों के कारण की पुष्टि तो पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से ही होगी। जो अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। वहीं जिला प्रशासन की शुरु हुई कवायदों से साफ संदेश जा रहा है कि चार मासूमों की मौत मलेरिया से ही हुई है। ऐसे में इन मौतों के लिए जिम्मेदार कौन …! कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं…? किसे बचाने की चल रही कवायद ..!

जिला प्रशासन सक्रिय है। प्रशासनिक अमला प्रभावित इलाकों में चौपाल लगाकर मलेरिया से रोकथाम और बचाव के उपाय बता रही है। संदिग्ध मरीजों के खून के नमूने लेकर मलेरिया की जांच भी की जा रही है। रिपोर्ट पाज़िटिव आने पर पीड़ित मरीजों को बेहतर इलाज के लिए उच्च सरकारी अस्पतालों में रेफर भी किए जा रहे हैं। वहीं प्रशासन हालात काबू में होने और किसी भी स्थिति से निपटने तैयारी पूरी होने के दावें भी कर रहा। मलेरिया से हुई मौतों के लिए जिम्मेदार होने का ठीकरा कथित झोला छाप लोगों पर फोड़ा जा रहा। ताबड़तोड़ कार्रवाई कर झोला छाप लोगों (डॉक्टर नहीं) की दुकानों जो मरीजों को इंजेक्शन और स्लाइन चढ़ाकर अंग्रेजी दवाइयां खाने के सुझाव लिख कर दे रहे है पर सिलिंग की कार्रवाई कर रहे हैं। वहीं प्रभावित इलाकों में जमीनी स्वास्थ्य अमला पूरी तरह नदारद दिख रहा। चार मासूमों की मौत के बाद जिला और स्वास्थ्य प्रशासन की उपजी सक्रियता का जायजा लेने के लिए हम रविवार को प्रभावित इलाकों के सरकारी अस्पतालों में पहुंचे तो तस्वीरें चौंकाने वाली थी।

जिला मुख्यालय से कोटा ब्लॉक के ग्राम पंचायत पुड़ू की दूरी करीब पचास किलोमीटर है। जहां उप स्वास्थ्य केंद्र जिसे अब वेलनेस सेंटर या आयुष्मान आरोग्य मंदिर के नाम से जाना जाता है में ताला लटक रहा था। भवन के छत के सामने के हिस्से के कांक्रीट का मलबा गिरा पड़ा है। ऐसा लग रहा है कि महीनों से भवन को खोला नहीं गया है। इसके करीब से गुजर रहे ग्रामीणों ने पूछने पर बताया कि कभी कभार कोई आ जाता है। किन किन लोगों की ड्यूटी यहां लगाई गई है कोई भी ग्रामीण बताने की स्थिति में नहीं है।

इस बारे में गांव की सरपंच पावे टोप्पो कहती हैं अस्पताल भवन जर्जर हो गया है। इसकी वजह से वह बंद रहता है। इसके चलते स्थानीय लोगों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। बीमार होने पर उपचार व प्रसव कराने चपोरा, रतनपुर ले जाना पड़ता है। गंभीर मरीजों को एंबुलेंस नहीं मिलने पर काफी दिक्कत होती है। उन्होंने ने तीन स्वास्थ्य कर्मियों के पदस्थ होने की जानकारी दी। सरपंच ने स्वास्थ्य कर्मियों को ही डॉक्टर होना बताया। अंचल में फैले मलेरिया पर उन्होंने कहा कि सर्वे कर बीमार लोगों की जानकारी जुटाई जा रही है।

गांव की मितानिन नीरा बाई कहती हैं गर्मी के समय अस्पताल का छत गिर गया है। टीका करण का काम आंगनबाड़ी केंद्र भवन तो कभी अन्य जगहों पर बैठ कर स्वास्थ्य कार्यकर्ता कर लेती हैं। उन्होंने बताया काफी समय से मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरदानी नहीं मिला है। पानी में डालने के लिए पावडर देकर गए हैं। मलेरिया और सामान्य बुखार की दवाओं के साथ जीवन रक्षक दवाएं मरीजों को देने उसे उपलब्ध कराई गई है।

प्रशासन के निर्देश कितना गंभीर अमला 

इसी इलाके के ग्राम पंचायत छतौना में भी उप स्वास्थ्य केंद्र/ वेलनेस सेंटर अब का आयुष्मान आरोग्य मंदिर है। डबल स्टोरी भवन तो देखने में ठीक ठाक है। पर यहां भी ताला लटका रहा था। ग्रामीणों ने बताया कि कल ही चौपाल लगाकर अनुविभागीय कार्यपालक दंडाधिकारी ने लोगों को मलेरिया से बचाव के उपाय बताए थे। मुख्यालय में ही स्वास्थ्य कर्मियों को रहने के निर्देश की गंभीरता की हवा आयुष्मान आरोग्य मंदिर की तालाबंदी निकाल रही थी। इसी गांव में कोटा ब्लॉक के जनपद अध्यक्ष और एक अन्य महिला जनपद सदस्य का निवास है। जनपद सदस्य प्रतिनिधि रघुवीर सिंह आर्यों ने बताया स्वास्थ्य कार्यकर्ता वहीं रहती है। आज रविवार है कहीं गई होंगी जानकारी नहीं है। गांव में मलेरिया का प्रभाव ज्यादा नहीं है। जांच में एक-दो मामले सामने आएं उन्हें इलाज के लिए भेजा गया है। डॉक्टर नहीं होने से प्रसव के लिए महिलाओं को केंदा, बेलगहना, कोटा,‌ रतनपुर लेकर जाना पड़ता हैं।

             मैं यहां का सब कुछ हुं …

जिला मुख्यालय से केंदा की दूरी करीब 65 किलोमीटर है। यहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। दोपहर दो बजे अस्पताल परिसर में दवाएं लेने काफी मरीजों की मौजूदगी थी। अंदर डाक्टर के कमरे की कुर्सी खाली थी। आगे फार्मासिस्ट का कमरा जहां दवाएं दी जा रही थी में बैठे व्यक्ति से डाक्टर के बारे में पूछा तो बोले क्या काम है। हमने कहा मिलना है आप फार्मासिस्ट है उसने चिढ़ते हुए कहा मैं ही यहां सब कुछ हुं। मरीजों को दवाएं देने के बाद वे सज्जन डॉक्टर के कमरे में रखी सीट पर बैठ गए और हमसे बात की। उन्होंने बताया कि वे आरएमओ हैं हमने अस्पताल में कार्यरत लोगों और डॉक्टर की जानकारी चाही तो उन्होंने खुद को इस संबंध में बोलने के लिए अधिकृत नहीं होने की बात कही।

भगवान भरोसे हालात 

ग्राम पंचायत पुड़ू और छतौना की ही तरह ग्राम कंचनपुर स्थित उप स्वास्थ्य केन्द्र/आयुष्मान आरोग्य मंदिर का था। डबल स्टोरी इस अस्पताल भवन के दरवाजे पर ताला लटक रहा था। रतनपुर बेलगहना मुख्य मार्ग पर स्थित इस अस्पताल की हालत भगवान भरोसे दिखी। एक तरफ तो जिला प्रशासन के निर्देश पर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर झोला छाप लोगों (डॉक्टर नहीं) की दुकानों जो मरीजों को इंजेक्शन और स्लाइन चढ़ाकर अंग्रेजी दवाइयां खाने के सुझाव लिख कर दे रहे है पर सिलिंग की कार्रवाई कर रहे हैं। वहीं स्वास्थ्य विभाग का अमला ग्रामीण को सहज सुलभता से स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए बनाएं गए भवनों में ताले जड़ कर मुख्यालय से नदारद है। इन पर कार्रवाई करने के बजाएं प्रशासन शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ा रही है। ऐसे व्यवस्था से दो चार लाचार आदमी कहां जाएं ….

दावां : पॉजिविटी रेट 4.60 से घटकर अब 0.51 प्रतिशत

मलेरिया के वार्षिक परजीवी सूचकांक दर के अनुसार, 2018 में छत्तीसगढ़ में मलेरिया की दर 2.63 फीसदी थी जो 2023 में घटकर 0.99 फीसदी रह गई है। इसी तरह बस्तर में यह दर 16.49 फीसदी से घटकर 7.78 फीसदी रह गई है। मलेरिया उन्मूलन अभियान के तहत 2020 से 2023 के दौरान, पहले से नौंवे चरण तक मलेरिया धनात्मक दर 4.60 फीसदी से घटकर 0.51 फीसदी हो चुकी है। इस अभियान का दसवां चरण भी 5 जुलाई 2024 को समाप्त हुआ है। इस अभियान के तहत राज्य में 22 जिलों में 16.97 लाख कीटनाशक युक्त मच्छरदानियों का वितरण भी किया गया है।