रोपण, संरक्षण और संवर्धन की जरूरत

बिलासपुर। सीजन फलों का। होलसेल और रिटेल काऊंटर गुलज़ार हैं लेकिन इन सबके बीच बड़हल याने मंकी जैक फ्रूट नजर नहीं आ रहे हैं क्योंकि औषधिय गुणों से भरपूर यह प्रजाति अब विलुप्ति की राह पर है।

देश स्तर पर चल रहे पौधरोपण के अभियान में जिन प्रजातियों का रोपण किया जा रहा है, उनमें बड़हल का नाम नहीं है। ऐसे में एक बार फिर से इस प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन पर अलग से कार्ययोजना की जरूरत बताई जा रही है क्योंकि फल के साथ पत्तियाँ, छाल और बीज में महत्वपूर्ण औषधिय गुणों के होने की जानकारी मिली है।


मिले यह मेडिकल प्रापर्टीज

नाम है बड़हल। पहचाना जाता है मंकी जैक फ्रूट के नाम से। इसके फलों में बीटा कैरोटिन, विटामिन ए और सी होता है। फास्फोरस, कैल्शियम, मैग्नीशियम, काॅपर, जिंक, एंटी डायबिटिक, एंटी इन्फ्लेमेंटरी, एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरस जैसे महत्वपूर्ण औषधिय गुणों की प्रचुर मात्रा में होने की जानकारी सामने आई है। फल ही नहीं, बीज, पत्तियाँ और छाल में भी ऐसे ही गुणों का होना पाया गया है।


नियंत्रण में यह बीमारियां

बड़हल के फल के सेवन से शुगर और कैंसर जैसी घातक बीमारी को दूर रखा जा सकता है। इसके अलावा लिवर को स्वस्थ रखता है। रक्त प्रवाह को सुचारू बनाए रखने में बड़हल का सेवन मददगार माना गया है। फाइबर की भरपूर मात्रा अपच जैसी आम स्वास्थ्यगत समस्या को दूर रखती है। नेत्र विकार रोकने में सक्षम बड़हल का सेवन रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। त्वचागत समस्या भी दूर रखता है।


जानिए मंकी जैकफ्रूट को

मोरेंसी परिवार से संबंध रखने वाला बड़हल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में बेहतर परिणाम देता है। वृक्ष की ऊंचाई 10 से 15 मीटर तक होती है। पत्तियां 25 से 30 सेंटीमीटर लंबी और 15 से 20 सेंटीमीटर चौड़ी होती हैं। बेडौल आकृति वाले फल का आकार 2 से 5 इंच होता है। स्वाद में थोड़ा खट्टा और थोड़ा मीठा स्वाद वाला यह फल अब सीजन में भी नजर नहीं आता क्योंकि संरक्षण, संवर्धन ही नहीं, रोपण को लेकर भी जागरूकता सिरे से गायब है।


संरक्षण बेहद जरूरी

ऑटोकॉर्पस लकुचा अपने नैसर्गिक गुणों की वजह से पोषण, गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण, कृषि एवं वन पारिस्थितिक तंत्र विविधिकरण के लिए उचित प्रजाति है। नए बाजार के अवसर पैदा करने में सक्षम यह प्रजाति संरक्षण और संवर्धन मांग रही है क्योंकि इसका नाम विलुप्त होने वाली प्रजातियों की सूची में आ चुका है।
– अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री, बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर