छह राज्यों के बाद महानीम की दस्तक अब छत्तीसगढ़ में
बिलासपुर। सह सकता है, उच्च से उच्चतम तापमान। महानीम के नाम से पहचानी जाने वाली इस प्रजाति के पौधों की मांग ने, जिस तेजी से फैलाव लिया है, उससे नर्सरियां अचंभित हैं। सप्लाई लाईन कमजोर न होने पाए, इसके लिए फिर से नई नर्सरी तैयार की जा रही है।
ताजा-ताजा शुरू हुई वन संपदा योजना को जैसा प्रतिसाद मिल रहा है, उससे वन विभाग हैरत में है। चाही जाने वाली प्रजाति नही मिलने की स्थिति में निजी क्षेत्र की नर्सरियों में मांग पहुंचने लगी है। इन सबके बीच अब तक अनजान रहे महानीम को पहली बार जैसी प्रमुखता मिल रही है, उससे वन विभाग और निजी क्षेत्र की नर्सरियां नए पौधे तैयार करने में लग चुकी हैं।

इस तापमान पर भी हरा-भरा
प्रकाश पसंद करने वाली यह प्रजाति उच्च तापमान पर भी जिंदा रहती है।अनुसंधान में इसे उच्च से उच्चतम तापमान सहन करने वाला वृक्ष पाया गया है। जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती गर्मी के बीच यह एक मात्र ऐसी प्रजाति होगी, जो सूखे दिनों में भी हरी-भरी रहती है। यही वजह है कि मांग की सूची में अव्वल नंबर पर महानीम का नाम है।
ऐसा है जीवन चक्र
समकक्ष वानिकी वृक्षों की तुलना में महानीम की उम्र भले ही 50 वर्ष की मानी जाती है लेकिन छोटे से जीवन चक्र में बहुतेरे लोगों के लिए उपयोगी है। दोमट और रेतीली भूमि पर सिंचित या असिंचित दोनों अवस्था में तैयार होने वाला महानीम 5 से 13 टन लकड़ी का उत्पादन देता है। बीच के दिनों में कटिंग और ग्राफ्टिंग से निकलने वाली लकड़ियां घरेलू उपयोग के काम आती है।

सूखे दिनों में हरा चारा
सूखे दिनों में भी महानीम की पत्तियां हरी रहती हैं।इसलिए ऐसी अवस्था में मवेशियों के लिए यह सर्वोत्तम पशु आहार मानी गई है। ग्राफ्टिंग, कटिंग के दौरान निकलने वाली पत्तियां भी इस काम के लिए उपयोग में लाई जा सकती है। सालाना उत्पादन की बात करें, तो 5,10 और 40 वर्ष की उम्र का पेड़ 100 से 500 किलो हरा चारा देने में सक्षम है।
लकड़ियों की मांग यहां से
नाव बनाने के लिए महानीम की लकड़ियां सबसे अच्छी मानी गई है। इसलिए नाव निर्माण का यह क्षेत्र इस प्रजाति की लकड़ी की मांग करता है। खिलौना और माचिस बनाने वाली ईकाइयां इसकी सबसे बड़ी खरीददार हैं, जहां से पूरे साल मांग निकलती है। याने लकड़ियों का बाजार विशाल है।

यहां भरपूर
अनुसंधान में मिली सफलता के बाद महानीम का फैलाव गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा में सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। मैदानी और पठारी क्षेत्रों में महानीम ने जैसी हरियाली लाई है,उसके बाद अन्य राज्यों में रोपण को लेकर रुझान बढ़ रहा है।
योगदान अमूल्य
पर्यावरण की दृष्टि से हरा चारा और अन्य उत्पाद बनाने में इसका योगदान अमूल्य है। महानीम की लकड़ी बहुत ही नरम और लचीली होती है, इसलिए फर्नीचर, लकड़ी के खिलौने, दरवाजे बनाए जाते हैं। प्लाईवुड इंडस्ट्रीज में इसका बहुत महत्व है।
– अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री, बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
