राष्ट्र ध्वज कागज नही, खादी का चाहिए
सुखद बदलाव यहां
बिलासपुर। कागज का नहीं, खादी का तिरंगा चाहिए। यह लाईन चौंका रही है। मांग क्षेत्र में यह नया बदलाव सुखद हवा के झोंके की तरह पहुंच रहा है।और भी ज्यादा दिलचस्प यह कि खादी के तिरंगे की कीमत में कहीं कोई वृद्धि नहीं हुई है।
गणतंत्र दिवस की तैयारियां चालू हो चुकी है। तिरंगा बनाने वाली ईकाइयों में न केवल मांग पहुंचने लगी है बल्कि दिए जा रहे आर्डर की आपूर्ति किया जाना भी चालू हो चुका है। बरसों बाद स्टेशनरी दुकानें यह देख रहीं हैं कि इस बार कागज से बने तिरंगे की मांग कमजोर है। सिंथेटिक कपड़े से बने तिरंगे भी कम खरीदे जा रहे हैं।इसलिए खादी के तिरंगे मांग में खूब बने हुए हैं।
जस का तस
शासकीय कार्यालयों से ही निकलने वाली खादी के तिरंगे की मांग इस बरस तेजी से विस्तार ले रही है। स्कूलों के अलावा शैक्षणिक संस्थानें भी खादी के तिरंगे ही मांग रहीं हैं, तो निजी क्षेत्र से भी निकल रही मांग और खरीदी से निर्माण इकाइयों को नया जीवन मिल रहा है। स्थिर कीमत के बीच इस बरस खादी के तिरंगे 350 से 950 रुपए तक की कीमत में लिए जा रहे हैं।
इसे इंतजार है
कागज और सिंथेटिक कपडे़ का तिरंगा आ चुका है लेकिन मांग ने यहां दस्तक तक नहीं दी है। पूछ-परख तो हो रही है लेकिन खरीदी को लेकर रुझान जरा भी नजर नहीं आता। इसलिए यह दोनों अपेक्षित मांग के इंतजार में हैं। मालूम हो कि दोनों की कीमतों में तेजी आई हुई है।

अव्वल हैं स्कूलें
हमेशा की तरह स्कूलें ऐसी पहली मांग क्षेत्र हैं, जहां तिरंगा की डिमांड निकल रही है। इस बार यह मांग बढ़त लेती नजर आ रही है क्योंकि कीमत स्थिर है। दिलचस्प यह कि बच्चों में भी खादी का तिरंगा पहले क्रम पर आ रहा है। इसके साथ निजी क्षेत्र की शैक्षणिक संस्थानों में भी ऐसे ही तिरंगे खरीदे जा रहे हैं।
रुझान बढ़िया
इस बार खादी से बना तिरंगा मांग में पहले स्थान पर है। सिंथेटिक कपड़े और कागज से बने तिरंगे में खरीदी को लेकर रुझान कम है।
– हिमांशु मिश्रा, महावीर पुस्तकालय, बिलासपुर
