खाई-खजाना बनाने वाले कर रहे प्रयास
बिलासपुर। स्थानीय स्तर पर काम करने वाली इकाइयों की मेहनत रंग लाई, तो बाजरा के नूडल्स,कुकीज़ और कुरकुरे की दस्तक बाजार में हो सकती है। इसके पहले बाजरा का बिस्किट और लड्डू उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगा है।
विश्व बाजरा वर्ष की शुरुआत में जैसी सफलता मिल रही है, उससे अनाज बाजार के बाद खुश होने की बारी उन छोटी इकाइयों की है जो स्थानीय स्तर पर खाद्य सामग्री बनाती हैं। पहला प्रयोग बिस्किट बनाने पर किया गया। सफलता मिली। लड्डू बनाए गए। इसे भी उपभोक्ता हाथों-हाथ ले रहा है। अब प्रयोग किया जा रहा है ऐसी खाद्य सामग्री तैयार करने का जिसके उपभोक्ता युवा और बच्चे हैं।

नूडल्स, कुकीज और कुरकुरे
उपभोक्ता क्षेत्र विशाल है। इसलिए पोषक तत्वों से भरपूर बाजरा के नूडल्स, कुकीज और कुरकुरे बनाने के प्रयास शुरू किए जाने के संकेत मिल रहे हैं। इस काम में ऐसी छोटी इकाइयां सामने आ रहीं हैं जिन्हें गांव- देहात के साप्ताहिक बाजारों में खाई-खजाना बनाने और बेचने वाली दुकानों के नाम से पहचाना जाता है।

सेल्फ लाइफ बाजरा की
सामान्य अवस्था में भंडारित बाजरा 3 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है लेकिन भंडारण का मानक पालन करने पर यह दोगुनी अवधि तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे जरूरी गुणवत्ता बनी रहती है। इसलिए भंडारण के तरीके पर ध्यान रखना जरूरी होगा।

स्वीकार्यता जरूरी
रिटायर्ड एग्रोनॉमी साइंटिस्ट डा. एस आर पटेल कहते हैं कि उच्च पोषक तत्वों से भरपूर बाजरा से नूडल्स, कुकीज़ और कुरकुरे बनाया जा सकता है। जो सामग्रियां बनाई जा रहीं हैं उन्हें सफल तब ही कहा जा सकता है जब उपभोक्ताओं की स्वीकार्यता मिलेगी।अभी तक मिल रहे रूझान अच्छे भविष्य का संकेत दे रहे हैं।
