रबी फसलों की बढ़वार पर रोक

भाटापारा। रबी की फसलों को अब यूरिया चाहिए क्योंकि यह 25 से 30 दिन की हो चुकी है, लेकिन बाजार में इसकी उपलब्धता जरा भी नहीं है। इधर सोसाइटियों के भंडारगृह इस उर्वरक से लबालब हैं लेकिन मार्कफेड और समितियों के बीच सामंजस्य का अभाव, एक ऐसे संकट की ओर कदम बढ़ा चुका है जो फसलों की ग्रोथ पर ब्रेक के रूप में सामने आ रहा है।

खरीफ के सीजन में यूरिया की बिक्री में चांदी काट चुका उर्वरक बाजार अब रबी सत्र में भी लाभ उठा रहा है। जानकारी है लेकिन शिकायत का इंतजार कर रहे कृषि विभाग ने जैसी चुप्पी साध रखी है, उसकी मिसाल शायद ही किसी दूसरे जिले में मिलेगी। बोनी के पहले अतिरिक्त सामग्री लेने पर ही यूरिया की प्रति बोरी की खरीदी 500 से 600 रुपए में करनी पड़ी। अब हालात एक बार फिर से संकट के बन चुके हैं क्योंकि समितियां यूरिया के विक्रय से इंकार कर रहीं हैं।

यहां मैदान साफ

बीते एक पखवाड़े से यूरिया उत्पादक कंपनियों से आपूर्ति पूरी तरह बंद हो चुकी है। रबी सत्र के शुरुआत में संकट की आहट से आशंकित किसानों को बाजार की शर्त पर यूरिया की खरीदी करनी पड़ी लेकिन वह भी खत्म हो चुकी है। 25 से 30 दिन की उम्र पर पहुंच चुकी फसलों को फौरन यूरिया की जरूरत है क्योंकि ग्रोथ पर ब्रेक लगने लगा है, लेकिन बाजार खाली है और जिम्मेदारों ने खामोशी की चादर ओढ़ रखी है।

समितियों का इनकार

80 फ़ीसदी मार्कफेड और 20 फ़ीसदी खुले बाजार के लिए। इस अनुपात में यूरिया के वितरण के बाद समितियों के गोदाम यूरिया से भरे हुए हैं लेकिन रबी की फसल के लिए उर्वरक के विक्रय पर बेहद सख्ती के साथ समितियों ने बंदिश लगाई हुई है। लिहाजा संकट तेजी से विस्तार ले रहा है। किसान भटक रहे हैं और मार्कफेड ने मौन साध लिया है।

संकट में साथ इसका

दानेदार यूरिया की अनुपलब्धता के बाद तरल यूरिया इस समय किसानों का भरपूर साथ दे रहा है। आसान परिवहन जहां इसे किसानों के बीच लोकप्रिय बना रहा है, तो छिड़काव का तरीका और बेहतर परिणाम भी इसे खेतों तक पहुंचा रहा है। कमी सिर्फ एक बात की है, वह यह कि विभाग और मैदानी अमला ने इसके उपयोग की सलाह से अभी भी दूरी बनाई हुई है। इसकी वजह से हर किसान तक इसकी पहुंच नहीं हो पा रही है।