बिलासपुर। ओडिसा ड्रम स्टिक-3, कोयंबटूर टाईप-1, जाफना- टाईप और भाग्य के डी एम-1। मुनगा की यह चार प्रजातियां अब पूरे साल सब्जी बाजार में नजर आएंगी। बारहमासी फलने वाली यह नई किस्म कोटा, मरवाही के बाद छत्तीसगढ़ के सभी जिलों के लिए अनुशंसित की जा रही है।
मूल्य संवर्धन, पत्तियों का पाउडर के रूप में उपयोग का बढ़ता चलन, चाय, न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट और तेल। इसके अलावा मुनगा बड़ी। यह ऐसे प्रमुख उत्पाद हैं, जो मुनगा को कृषि वानिकी मॉडल, पोषण योजना से जोड़ने का मजबूत आधार बन रहे हैं। यह आधार ही छह ऐसी उन्नत प्रजातियों की खोज की वजह रही जिनके वृक्ष कोटा, मरवाही के वनांचलों में न केवल बढ़ रहे हैं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।

इसलिए यह प्रजाति
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, विस्तार लेता जल संकट तथा सीमांत किसानों की आय संबंधी चुनौतियों को देखते हुए कृषि के क्षेत्र में विविधीकरण की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे समय में मुनगा एक ऐसी बहुउद्देशीय वृक्ष की सब्जी फसल के रूप में उभर रहा है, जो पोषण सुरक्षा, अतिरिक्त आय तथा जलवायु अनुकूल कृषि प्रणाली को मजबूत करता है।
अब पूरे साल मुनगा
पी के एम-1, पी के एम- 2, कोयंबटूर टाइप, जाफना टाइप, के डी एम- 1 और एम ओ। मुनगा की यह छह उन्नत प्रजातियां न केवल 18 से 30 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष उत्पादन देतीं हैं बल्कि पूरे साल फलन की अवस्था में रहती है। इन प्रजातियों को प्रदेश के मैदानी, उत्तरी पहाड़ी तथा दक्षिण बस्तर के पहाड़ी क्षेत्र के लिए विशेष माना गया है। इसके अलावा बिलासपुर, रायगढ़, कोरबा, जांजगीर, धमतरी, सरगुजा, रायपुर और दुर्ग जिलों के लिए भी अनुशंसित किया गया है।

छत्तीसगढ़ की जलवायु के अनुकूल
प्रदेश की जलवायु के अनुकूल मानी गई यह प्रजातियां 18 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान और 1000 से 1400 मिमी बारिश में भी तैयार होने में सक्षम हैं। ग्रीष्मकालीन सूखा सहन करने की अपार क्षमता इसलिए क्योंकि गहरी जड़ प्रणाली होती है इन प्रजातियों में। महत्वपूर्ण गुण यह है कि यह नई प्रजातियां मिट्टी की सेहत बनाए रखतीं हैं और कार्बन अवशोषण में अहम भूमिका निभाती है।
बनेगा आय और पोषण का आधार
बारहमासी मुनगा की उन्नत प्रजातियां जलवायु परिवर्तन और जल संकट के दौर में किसानों के लिए टिकाऊ विकल्प बन रही हैं। वर्षभर उत्पादन, मूल्य संवर्धित उत्पादों की बढ़ती मांग तथा कृषि-वानिकी मॉडल में इसकी उपयोगिता किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करेगी। छत्तीसगढ़ की जलवायु परिस्थितियों में यह फसल विशेष रूप से सफल और लाभकारी साबित हो सकती है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
