बिलासपुर। नाम है रूबी, थॉम्पसन, डंकन और मार्श। काम है वजन को नियंत्रण में रखना और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह चार छत्तीसगढ़ से अपने लिए संभावनाएं खोज रहे हैं।
विलुप्ति की राह पर चल रहा चकोतरा अब छत्तीसगढ़ में अपने लिए जगह की खोज में है। प्रारंभिक सर्वेक्षण में चकोतरा ने बस्तर, सरगुजा, रायगढ़ और बिलासपुर के वनांचलों को अपने लिए एकदम सही माना है। मदद के लिए तैयार वानिकी वैज्ञानिकों ने भी प्रयास चालू कर दिए हैं क्योंकि यह प्रजातियां जैम, जेली, जूस और मुरब्बा बनाने वाली इकाइयों की नजर में आ चुकीं हैं।

जानिए चकोतरा को
खट्टे फलों के समूह का महत्वपूर्ण फल है चकोतरा। खट्टा, मीठा और थोड़ा कसैला स्वाद वाला चकोतरा संतरा से कुछ बड़े आकार का होता है। मेडिशनल प्रॉपर्टीज से भरपूर चकोतरा के पेड़ सीमित होते जा रहे हैं। दिलचस्प यह कि चकोतरा चार से पांच वर्ष की उम्र पूरी करते ही फल देने लगता है। इस उम्र में प्रति वृक्ष 30 से 40 फल मिलते हैं, तो बाद के सालों में यह संख्या 100 से 150 तक पहुंच जाती है।
यह चार, चकोतरा की नजर में
बस्तर, सरगुजा, रायगढ़ और बिलासपुर के वनांचलों का सामान्य तापमान 20 से 35 डिग्री सेल्सियस होता है। सालाना बारिश 1000 से 1500 मिली मीटर होती है। दोमट और बलुई मिट्टी वाली इन चारों जिलों की खेतीहर भूमि उच्च जल निकास प्रणाली वाली मानी जाती है। ऐसी ही भूमि चाहिए चकोतरा को। इसलिए इन्हीं जिलों में अपने लिए संभावनाएं खोज रहा है चकोतरा।

मिले यह मेडिशनल प्रॉपर्टीज
चकोतरा पर हुए अनुसंधान में इसमें विटामिन- सी, भरपूर रेशा, पोटेशियम और भरपूर मात्रा में कैलोरी का होना प्रमाणित हुआ है। इन औषधिय तत्वों की मदद से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और हृदय को मजबूत बनाया जा सकता है। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने की वजह से चकोतरा का सेवन वजन को भी काबू में रखता है।
समय रोपण का
चकोतरा के पौधे का रोपण साल में दो बार किया जा सकता है। पहला फरवरी और मार्च के मध्य में। दूसरा समय जुलाई से अगस्त के बीच का इसलिए बेहतर माना गया है क्योंकि यह दोनों महीने मानसून की सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। लिहाजा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। जरूरत केवल जल निकास प्रणाली को दुरुस्त रखने की होती है।

पोषण और आय का उभरता संभावनाशील फल
चकोतरा छत्तीसगढ़ की जलवायु और मृदा परिस्थितियों के लिए उपयुक्त फल प्रजाति है। इसके वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रसंस्करण (वैल्यू एडिशन) और बाजार से जुड़ाव के माध्यम से इसे किसानों की आय बढ़ाने और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रभावी साधन बनाया जा सकता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
