शान के पहनावे बने पैबंद लगे परिधान

रफू कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट

भाटापारा। अब फटे पैंट और शर्ट रफू नहीं करवाए जाते। शान से पहले जा रहे, ऐसे परिधान न केवल फैशन में आ चुके हैं बल्कि ऑनलाइन शॉपिंग में भी मिल रहे हैं क्योंकि पैबंद में भी, अब डिजाइन चाही जा रही है।

50 बरस से टेलरिंग कारोबार से जुड़े भगवती देवांगन को आज भी वह दिन याद है, जब इस काम में पहला कदम रखा था।तब फटी शर्ट या फटी पैंट, शर्म का कारण बनती थी। आज शर्म नहीं, शान से पहनी जा रही है। भगवती ने कल्पना भी नहीं की थी कि कटे-फटे कपड़े भी फैशन में आएंगे। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इससे इंकार नहीं है लेकिन उन रफू कारीगरों का क्या होगा ? जिनकी रोजी-रोटी इस काम से चलती थी।

पैबंद में भी डिजाइन

परिधान के क्षेत्र में आया बदलाव देखकर भगवती बेहद हैरत में है। कभी सोचा भी नहीं था कि पैबंद भी डिजाइन में मांगे जाएंगे। हद तो तब, जब कीमत भी, डिजाइन के मान से तय होती देखी जाती है। मालूम हो कि सामान्य आकार- प्रकार के पैबंद वाले पेंट 500 और थोड़ा अजीब से पैबंद लगे पैंट 5000 रुपए में मिलने लगे हैं।

ब्रांडेड पैबंद

बदलाव यहां तक आ चुका है कि इसमें भी ब्रांड चलने लगा है। याने पैबंद भी ब्रांडेड हो गए हैं। और जब ब्रांड बन रहा हो तो, कीमत का बढ़ना बाजार का हिस्सा ही माना जा सकता है। हां, एक बात और, अब ऐसे पैबंद वाले परिधान ऑनलाइन शॉपिंग में भी उपलब्ध होने लगे हैं।

संकट में रफू कारीगर

एक वह भी समय था ,जब टेलरिंग दुकानों में रफू कारीगर की हैसियत ऊंची रहा करती थी क्योंकि बड़े होते बच्चों के कपड़े, छोटे बच्चों के हिस्से में आते थे। लिहाजा कटे-फटे कपड़ों की मरम्मत का जिम्मा ऐसे कारीगरों पर ही होता था। आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकीं हैं। रफू कारीगर खाली हाथ हैं क्योंकि रफू के लायक कपड़े फैशन में आ चुके हैं। रोजी- रोटी के संकट का सामना कर रहा रफू कारीगर भी, भगवती की ही तरह हैरत में है, और हताश भी…!