बदलाव की बयार ने पारंपरिक परिधान का बाजार समेटा

बिलासपुर। धोती। अब इसमें मुहूर्त सौदा नहीं होता। वह 80 का दशक था, जब 100 गठान से कम के मुहूर्त सौदे नहीं हुआ करते थे। अब स्थितियां बदल चुकीं हैं। परिधान के बाजार से धोती, तेजी से अपनी जगह खोती जा रही है। हालात इस कदर बदले हुए हैं कि मांग क्षेत्र से पूरी तरह खत्म हो चले, धोती निर्माण इकाइयों ने यूनिटों में दूसरे कपड़े बनाने चालू कर दिए हैं।

परिधान क्षेत्र में आ रहे नित नए बदलाव के बाद पारंपरिक वस्त्रों और पहनने वाले कपड़ों का बाजार तेजी से खत्म होता जा रहा है। दुर्दशा सबसे ज्यादा उस धोती की हुई है, जो कभी देश के परिधान क्षेत्र की शान थी। हर घर में पहनने वालों की मांग से सबसे ज्यादा बनने, बिकने और पहनने वाली धोती की पहचान पर खतरा बन रहा है क्योंकि पारंपरिक की जगह डिजाइनर परिधान तेजी से हर घर में पहुंच चुके हैं और सदियों से, पीढ़ियों से पहने जाने वाले वस्त्रों की जगह ले रहे हैं।

अब नहीं मुहूर्त सौदे

धोती बनाने वाली सूरत, कोलकाता और दक्षिण भारत के कपड़ा कारखानों के लिए तब दीपावली के एक माह पहले के दिन, मुहूर्त सौदे के लिए जाने जाते थे। समय था, जब सौ गठान से कम की मात्रा में सौदे नही होते थे। अब वह दिन नहीं रहे। डिजाइनर कपड़ों के प्रवेश के बाद नई पीढ़ी ने तेजी से धोती से किनारा किया। अब इसमें मुहूर्त सौदे नहीं होते।

यह थे मांग वाले प्रदेश

देश में वैसे तो हर प्रदेश में धोती की मांग होती थी लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, दक्षिण भारत के अलावा बिहार, राजस्थान और महाराष्ट्र के साथ मध्य प्रदेश की पहचान, धोती उत्पादक इकाइयों के बीच एक बेहतर संभावना वाले प्रदेश के रूप में होती थी। इन प्रदेशों की मांग सबसे पहले पूरी होती थी।उत्पादन भी इन राज्यों की मांग को देखकर किए जाते थे।

अब केवल दक्षिण भारत

90 का दशक, धोती की विदाई का साल बनकर आया। पश्चिमी परिधान की आंधी में तेजी से किनारे की जाती धोती, अब केवल दक्षिण भारत में ही चलन में रह गई है, लेकिन वहां भी इसे धोती की बजाय लूंगी के रूप में उपयोग किया जा रहा है। जबकि देश के शेष राज्यों में पूजा-पाठ और पंडित- पुरोहितों को देने के लिए ही खरीदी जा रही है। कहा जा सकता है कि अब यह चलन से पूरी तरह बाहर हो रही है।

अब ऐसा है बाजार

80 के दशक में 100 गठान तक का बाजार बनाने वाली धोती की स्थिति इतनी दयनीय है कि अब साल में एक गठान की भी मांग नहीं निकल रही है। मालूम हो कि एक गठान में 60 से 80 पीस धोती के होते हैं। बाजार दर इस समय 80 से 200 रुपए प्रति नग बने हुए हैं। बावजूद इसके उत्पादन और खपत, दोनो अंतिम पायदान पर आ चुके हैं।