छत्तीसगढ़ का मुकाबला अब गुजरात से

भाटापारा। मंडी शुल्क के विरोध में खरीदी बंद करने से हुई परेशानी के बाद, अब पोहा मिलें समय पर गाड़ियां नहीं मिलने की दिक्कत से जूझ रहीं हैं। रही-सही कसर डीजल की बढ़ती कीमत पूरा कर रही है, क्योंकि लोकल ट्रांसपोर्ट कंपनियों द्वारा असमर्थता जताने के बाद बाहरी राज्यों से आ रही ट्रकें बढ़ा हुआ भाड़ा मांग रहीं हैं।

मंडी शुल्क में बढ़ोतरी के विरोध में पोहा मिलों की हड़ताल के जैसे परिणाम आ रहे हैं, वह हताश करने के लिए काफी हैं। सीजन में यह दिक्कत, मांग वाले राज्यों के लिए गाड़ियों की अनुपलब्धता से हो रही है, तो संचालन में कुशल कामगार की कमी भी नियमित उत्पादन में रूकावट बन कर सामने आ रही है। ऐसी स्थिति में उत्पादन का स्तर सामान्य बनाए रखने के प्रयास के संकेत मिल रहे हैं।

लोकल गाड़ियां धान परिवहन में

हड़ताल के बीच के ही दिनों में शुरू हुई समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी में लोकल गाड़ियों के चलने से पोहा की मांग वाले राज्यों के लिए गाड़ियां नहीं मिल रहीं हैं। ऐसे में बाहर से आ रहीं गाड़ियों की पूछ-परख है लेकिन भाड़ा इतना ज्यादा बताया जा रहा है कि इसे क्षमता से बाहर माना जा रहा है।

गुजरात से कड़ी टक्कर

हड़ताल के दिनों में जब पोहा की मांग वाले प्रदेश महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश को आपूर्ति नहीं की जा सकी, तब इन राज्यों ने गुजरात और मध्य प्रदेश से मांग को आपूर्ति सुनिश्चित कर ली। छत्तीसगढ़ की तुलना में भाव भी अपेक्षाकृत कम था। अब छत्तीसगढ़ के सामने घटता बाजार, दोहरा संकट लेकर उपस्थिति दिखा रहा है।

उत्पादन और भाव

पोहा मिलें जिस तरह के संकट से दो-चार हो रहीं हैं, उसके बाद अब कीमतों में गिरावट का रुख बनता नजर आता है। उत्पादन का स्तर सामान्य बनाए रखने की योजना के साथ संचालित मिलें, मोटा पोहा 2900 रुपए और बारीक पोहा 3200 रुपए क्विंटल की दर पर सौदा ले रहीं हैं लेकिन इस भाव पर भी कारोबार संतोषजनक नहीं है।

मांग वाले राज्यों के लिए गाड़ियों के नहीं मिलने से सौदे कम हो रहें हैं। गाड़ियों की उपलब्धता सामान्य होते ही नियमित परिचालन को गति मिलेगी।

  • कमलेश कुकरेजा, अध्यक्ष, राज्य पोहा मिल एसोसिएशन, रायपुर