सता रहा पहचान खोने का डर

बिलासपुर। रियायत की राह देखता टेंट- कनात, डेकोरेशन और धुमाल कारोबार के सामने अब पहचान बनाए रखने का संकट आकर खड़ा हो चुका है। डेढ़ साल पहले पाई-पाई, जोड़ कर रखी जमा पूंजी कभी भी खत्म हो सकती है।

17 महीने से लगा ताला, अब तक नहीं खोला जा सका है। यह, वह कारोबार है जिसे टेंट- कनात, लाईट, डेकोरेशन और धुमाल पार्टी के नाम से जाना जाता है। आयोजन को यादगार बनाने वाला कैटरर्स भी आयोजन को मजबूती देता था। अब यह सभी अंतिम दिन की ओर कदम बढ़ा चुके हैं क्योंकि रियायत के पिटारे से इनके लिए अब तक कुछ भी नहीं निकल पाया है।


सब्जी व मनिहारी

बैंड या धुमाल पार्टी में काम करने वालों ने सब्जी सहित अन्य छोटे काम शुरू कर दिए हैं या फिर गांव- देहात के अलावा साप्ताहिक बाजार में मनिहारी सामान बेचकर परिवार की रोजी-रोटी का इंतजाम करना चालू कर दिया है। कुछ ऐसे भी हैं जो दैनिक दर पर व्यावसायिक ठिकानों में काम खोज लिए हैं। मेहनताना जरूर कम है लेकिन दूसरा कोई उपाय नहीं है।










यहां हालत बेहद खराब

भारी पूंजी लगाने के बाद तैयार होने वाला टेंट-कनात का कारोबार पूरी तरह चौपट हो चुका है। 17 महीने से लगा ताला, खोला तो जा चुका है लेकिन बुकिंग तो दूर, पूछ-परख तक नहीं है क्योंकि कोविड-19 के नियम अभी भी प्रभावशील हैं। ऐसे में काम करने वाले मजदूरों की संख्या तेजी से कम की जाने लगी है। चिंता एक ही बात की है कि बैंकों से लिए गए कर्ज का भुगतान कैसे किया जाएगा ?


अकेले हैं

कैटरर्स की याद नहीं आती। लॉक डाउन की स्थितियां भले ही जा चुकीं हैं लेकिन कैटरर्स अब भी इसके घेरे से बाहर नहीं निकल पाया है। शादी-ब्याह तो दूर, छोटे आयोजन के लिए तरसता कैटरर्स, एक-एक कर साथ छोड़ते कारीगर, सहयोगी को देख रहा है। रोकने के लिए मजबूत आधार या साधन हैं नहीं। दुखी मन से विदाई की जा रही है, यह कहते हुए कि काम चालू होते ही बुलाएंगे।