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कोरोनाकाल ने भारतीय स्वास्थ्य-व्यवस्था की पोल खोल दी है. चूंकि हमारें यहां सरकारें स्वास्थ्य पर तुलनात्मक रूप से कम खर्च करती है इसलिये स्वास्थ्य की कमजोर अधोसंरचना कोरोना वाइरस के बोझ को नहीं सह सकी. नतीजन, खासकर कोरोना की दूसरी लहर के दौरान चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ, अस्पताल में बिस्तरों की संख्या एवं जांच की सुविधा कम होने के कारण मरीजों तथा उनके परिजनों में अफरा-तफरी मची रही. इससे पहले तक मरीजों के परिजनों से जरूर खून की व्यवस्था करने को कहा जाता रहा है परन्तु कभी ऐसा नहीं सुना था कि अपने मरीज की सांसों को चलायमान रखने के लिये वे स्वंय ऑक्सीजन की व्यवस्था करें.

जनस्वास्थ्य सरकार की जिम्मेदारी होती है. यहां तक कि खर्च करने की काबिलियत न रखने वालों को भी चिकित्सा सुविधा से वंचित नहीं किया जाना चाहिये. आजकल चिकित्सा सेवा का भी कॉर्पोरेटीकरण हुआ है. लेकिन कॉर्पोरेट अस्पतालों में जाना मलाईदार तबकों के लिये ही संभव है. इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि क्या केवल मलाईदार तबके ही सरकार का चुनाव करते हैं या आम जनता इसे तय करती हैं. इसीलिये सरकारों को जिम्मेदारी है कि वे जनस्वास्थ्य के स्तर को ऊपर उठाने के मुद्दे को प्राथमिकता की सूची पर रखें. जनस्वास्थ्य को बाज़ार के भरोसे न छोड़कर सरकारें इसका जिम्मा खुद उठाये. सरकारों से हमारा तात्पर्य केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों से है.

भारत में कोरोना की पहली लहर के बाद ही संसदीय समिति की 123वीं रिपोर्ट ‘कोविड-19 महामारी का प्रकोप और इसका प्रबंधन’ राज्यसभा के अध्यक्ष को पेश किया गया. जिसमें रेखांकित किया गया कि देश में स्वास्थ्य पर सरकार बेहद कम खर्च करती है. साल 2017 में यह महज 1.5 फीसदी ही था. हालांकि ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ में 2025 तक जीडीपी का 2.5 फीसदी स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च का लक्ष्य रखा गया है परन्तु संसदीय समिति का मानना है कि इस लक्ष्य को 2 साल के भीतर ही पूरा किया जाये. दूसरी तरफ बकौल OECD या आर्थिक सहयोग और विकास संगठन का कहना है कि भारत में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन का 3.6 फीसदी खर्च होता है. जिसमें से राज्य एवं केन्द्र सरकार मिलकर 1.29 फीसदी खर्च करती है तथा जनता को अपने जेब से 2.31 फीसदी खर्च करना पड़ता है. यह साल 2020 का ही आंकड़ा है.

बता दें कि ‘ब्रिक्स कंट्रीज’ में भारत एक ऐसा देश है जो स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करता है. इसके बावजूद हम विश्वगुरू बनने का सपना देखते हैं. जिस देश की जनता ही कमजोर हो वह देश कैसे ऐसा दावा कर सकता है. जनस्वास्थ्य पर ब्राजील की सरकार 3.96, रूस की सरकार 3.16, दक्षिण अफ्रीका की सरकार 4.46 तथा चीन की सरकार 3.02 फीसदी अपने जीडीपी का खर्च करती है. वहीं 2018 के आंकड़ों के अनुसार जापान 9.21, अमरीका 8.51, इग्लैंड 7.86, आस्ट्रेलिया 6.41, इस्राइल 4.86, ईरान 3.98, मेक्सिको 2.69, संयुक्त अरब अमीरात 2.18 तथा पाकिस्तान 1.14 तथा भारत 0.96 फीसदी स्वास्थ्य पर अपने जीडीपी का खर्च करती थी. जाहिर है कि भारत जनस्वास्थ्य पर खर्च करने में बेहद कंजूसी करता है.

अब यदि भारत में केन्द्र एवं राज्य सरकारें मिलकर स्वास्थ्य पर खर्च को 2 गुना याने 3 फीसदी कर दें तो क्या होगा? वैसे भारत जैसे गरीब देश में आदर्श रूप से स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च 4 गुना या 6 फीसदी का होना चाहिये, यदि ऐसा किया जाता है तो क्या होगा इस पर भी एक सरसरी नज़र डाल देते हैं.

भारत में प्रति 10 हज़ार की आबादी के लिये अस्पतालों में 8.5 बिस्तर हैं. यदि इसे 2 गुना बढ़ा दिया जाये तो यह प्रति 10 हजार की आबादी के लिये 17 हो जायेगी अर्थात् प्रति हजार की आबादी के लिये करीब 1.7 बिस्तर तथा यदि 4 गुना भी बढ़ा दिया जाये तो प्रति 10 हजार के लिये 34 बिस्तर हो जायेंगे याने प्रति हजार के लिये 3.4 बिस्तर हो जायेंगे. वर्तमान में यह 1 से भी कम है.

आर्थिक सर्वे 2019-20 के अनुसार भारत में चिकित्सक और आबादी का अनुपात 1:1456 है. अर्थात् प्रति 1456 लोगों के लिये 1 चिकित्सक है. जबकि विश्व-स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि प्रति 1 हज़ार की आबादी के लिये 1 चिकित्सक होना चाहिये. अब यदि भारत में चिकित्सा पर खर्च को 2 गुना कर दिया जाता है तो प्रति 728 लोगों के लिये 1 चिकित्सक तथा 4 गुना करने पर प्रति 364 की आबादी के लिये 1 चिकित्सक हो जायेंगे.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 21 लाख 29 हजार 820 रजिस्टर्ड नर्स तथा रजिस्टर्ड मिडवाइफ हैं. इसके अलावा 56,644 लेडी हेल्थ विजिटर्स भी हैं. इनकी संख्या को भी तदनरूप बढ़ाया जा सकता है. गौरतलब है कि एक साथ पूरी आबादी बीमार नहीं पड़ती है इसलिये अस्पताल में बिस्तर, चिकित्सक तथा नर्सो एवं अन्य पैरा-मेडिकल स्टाफ की संख्या बढ़ाने पर देश की स्वास्थ्य अधो-संरचना मजबूत होगी. जिसका सीधा लाभ आम जनता को मिलेगा.

अब प्राथमिकता तय करना सरकार का काम है कि क्या वह स्वास्थ्य पर खर्च को बढ़ा सकती है? जरूर बढ़ा सकती है जनाब, बशर्ते कॉर्पोरेट टैक्स में छूट न दी जाये तथा बैंकों के कर्ज को डूबने न दिया जाये. और इन पैसों का उपयोग जनस्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने में किया जाये. क्या यह बात आवाम के समझ में आयेगी और आज जो साहिब-ए-मसनद उनके कानों तक पहुंच पायेगी? यदि ऐसा होता है तो भारत जनस्वास्थ्य के मामलों में तो विश्वगुरू जरूर बन सकता है