कीटनाशक और रासायनिक खाद ने बनाया दुश्मन
अर्थवर्म रिसर्च सेंटर पुणे का खुलासा
सतीश अग्रवाल
बिलासपुर। मुलायम और छिद्रयुक्त नहीं। कठोर एवं संकुचित। मिट्टी की संरचना में इस बदलाव का खुलासा पुणे की अर्थवर्म रिसर्च सेंटर ने किया है। कारणों की तह में जाने पर यह जानकारी सामने आई है कि अर्थवर्म यानी केंचुओं की संख्या कम हो रही है। समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो न केवल कृषि उत्पादन कम होगा बल्कि जल संकट का भी सामना करना होगा।
किसानों से रूठने लगे हैं दोस्त केंचुए। नजर नहीं आते बारिश के दिनों में दिखाई देने वाले यह जंतु। मानक से ज्यादा मात्रा में उर्वरक और कीटनाशकों का छिड़काव और जैविक खाद से जिस तेजी से दूरी बनाई जा रही है, उसके परिणाम अब नजर आने लगे हैं, यह घटता उत्पादन और साल-दर- साल गिरते भूजल स्तर के रूप में सामने है। उपाय हैं इस समस्या के स्थाई निदान के लेकिन पहल किसानों को करनी होगी।
हुआ यह खुलासा
अनुसंधान में यह खुलासा हुआ है कि मिट्टी की संरचना में तेजी से बदलाव हो रहा है। मिट्टी पहले जैसी मुलायम और छिद्रयुक्त नहीं रही। कठोर हो चुकी है, तो छिद्र संकुचित होने लगे हैं। इसकी वजह से पौधों की उचित बढ़वार नहीं हो रही है। असर कम उत्पादन के रूप में सामने है। दूसरा खुलासा इसलिए चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है क्योंकि कठोर और संकुचित छिद्र की वजह से बारिश का पानी नीचे नहीं जा पा रहा है। यह गिरते भूजल की बड़ी वजह मानी जा रही है।

साथ छोड़ रहे दोस्त
मिट्टी की संरचना में आ रहे इस बदलाव ने अनुसंधान के दायरे को जब बढ़ाया, तब यह जानकारी मिली कि यह परिवर्तन किसानों के दोस्त रहे केंचुओं की घटती आबादी की वजह से आ रहा है। क्यों कम हो रही संख्या ? जैसे सवाल का जवाब रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का अनुपातहीन छिड़काव के रूप में मिला। इसने दोस्त केंचुए को किसानों का साथ छोड़ने के लिए विवश कर दिया है।

ऐसे करते हैं मदद
अर्थवर्म यानी केंचुए। 1 एकड़ भूमि में लगभग 40 से 45 लाख की आबादी बारिश के दिनों में मिट्टी में लाखों छिद्र करती है। इससे रिसकर बारिश का पानी भूजल स्तर बनाए रखता है। इनके मल, मिट्टी को जरूरी पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इससे फसल उत्पादन बढ़ता है। मुलायम मिट्टी भूमि की जल धारण क्षमता को भी बढ़ाती है लेकिन नई समस्या सिंचाई की जरूरत को बढ़ा रही है। साथ ही जल संकट की स्थिति बारिश के दिनों में भी बढ़ा रहा है।

जैविक खेती से लौटेंगे
रिसर्च सेंटर ने जो उपाय सुझाए हैं, उसके अनुसार केंचुआ की वापसी की राह जैविक खेती की विधि से खुल सकती है। इससे उर्वरक पर निर्भरता कम होगी। कीटनाशकों की जगह गाजर घास, नीम, धतूरा और मंदार जैसी वनस्पतियों से तरल कीटनाशक बनाएं और उपयोग करें, तो किसानों और मिट्टी के यह दोस्त वापस लाए जा सकते हैं। मालूम हो कि एक केंचुआ एक अंडा देता है, जिससे 6 बच्चे निकलते हैं। जैविक और प्राकृतिक तरीके से खेती से यह संख्या बढ़ाई जा सकती है।

निभाते हैं महत्वपूर्ण भूमिका
केंचुए कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केंचुओं को अक्सर पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर भी कहा जाता है क्योंकि वे मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। परंतु आधुनिक खेती में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के लगातार प्रयोग से केंचुओं की संख्या में भारी कमी आई है जिससे भूमि में केंचुए नहीं पाए जाते।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
