करता है खत्म सर्दी और जुकाम
बिलासपुर। कहा जाता है ‘गम ऑफ गार्डन’। नाम है धावड़ा। वानिकी वृक्षों में एकमात्र ऐसी प्रजाति है, जो नैसर्गिक रूप से राल के रूप में गोंद निकालता है। गुणों की खान इसलिए है क्योंकि धावड़ा का यह प्राकृतिक उत्पाद, पुरानी खांसी और सर्दी खत्म करता है। शारीरिक दुर्बलता दूर करने का सबसे सरल साधन माना जा चुका है।
वर्षों से चल रहा है धावड़ा गोंद का कारोबार। महत्व इस बरस इसलिए बढ़ता देखा जा रहा है क्योंकि पौधरोपण की सूची में इसके लिए जगह की खोज की जा रही है। वैसे इसके पेड़ जशपुर, सरगुजा, गरियाबंद, मरवाही के वनांचलों में बहुतायत के साथ हैं। बताते चलें कि यह प्रजाति किसी भी भूमि और हर वातावरण में तैयार हो जाती है। बस, संरक्षण और संवर्धन पर ध्यान देना होगा।

इसलिए गम ऑफ गार्डन
निश्चित उम्र के बाद धावड़ा का वृक्ष राल के रूप में एक ऐसी सामग्री देता है, जो सूखने के बाद बेहद कड़ा और भूरे रंग के गोंद के रूप में पहुंचता है। नीम, बबूल या मुनगा की तरह गोंद के लिए काटने या छिलने की जरूरत नहीं होती बल्कि नैसर्गिक रूप से तना से स्त्राव करता है। तय अवधि तक चलने वाली इस प्रक्रिया की वजह से ही धावड़ा को ‘गम ऑफ गार्डन’ के खिताब से नवाजा गया है।

निजात पुरानी खांसी से
अनुसंधान में धावड़ा के गोंद का सेवन पुरानी खांसी से छुटकारा दिलाने के लिए बेहद अहम माना गया है। जुकाम खत्म करने के लिए रामबाण औषधि मानी गई है। शीत ऋतु में सेवन अहम होगा क्योंकि शारीरिक गर्मी बनाए रखता है धावड़ा का गोंद। शारीरिक दुर्बलता को दूर करने में भी सक्षम माना गया है।

लकड़ी लचकदार
धावड़ा की लकड़ी बेहद लचकदार होती है। इसके बावजूद मजबूती में यह उपलब्ध सभी प्रजातियों की लकड़ी को मात देता है। मजबूती की वजह से कृषि यंत्र और बैल गाड़ियों के पहिए बनाने में प्रमुखता के साथ उपयोग किया जाता है।

संरक्षण एवं संवर्धन जरूरी
धावड़ा वृक्ष सबसे अच्छा खाद्य गोंद देने वाली प्रजातियों के वृक्षों में से एक है। जिसे घट्टी गोंद के रूप में जाना जाता है। इसका उपयोग कैलिको प्रिंटिंग, दवाओं के निर्माण, पेंट, पेट्रोलियम, अगरबत्ती आदि उद्योगों में किया जाता है। अत्यधिक विदोहन से धावड़ा के प्राकृतिक वृक्ष कम होते जा रहे हैं अतः इसके संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सार्थक प्रयास करना होगा।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
