बिगड़े वनों में आएगी हरियाली

तेज धूप में तीव्र बढ़वार लेती है यह प्रजाति

सतीश अग्रवाल

बिलासपुर। तटीय क्षेत्र की खेतीहर भूमि अब तेज बहाव में भी सुरक्षित रहेगी। वानिकी वैज्ञानिकों ने वृक्ष की ऐसी प्रजाति की खोज करने में सफलता हासिल की है, जिसे कसोढ़ के नाम से जाना जाता है।

पौधरोपण की चलती व्यापक तैयारियों में पहली बार केसिया सियामिया का भी नाम सुना जा रहा है। पहचान के बाद जब इसके गुणों पर अनुसंधान किया गया, तो परिणाम बेहद चौंकाने वाले निकले। सबसे बड़ा गुण जो मिला है उसकी मदद से हर बरस, तेज बहाव में बह जाने वाली खेतिहर भूमि के नुकसान से बचा जा सकेगा। बेहद मूल्यवान था यह गुण। इसलिए वन विभाग और निजी क्षेत्र की नर्सरियों के जरिए कसोढ़ के पौधे प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने के प्रयास चालू हो चुके हैं।
ऐसा है कसोढ़

ऐसा है कसोढ़

वानिकी वैज्ञानिकों के बीच केसिया सियामिया के नाम से पहचान रखने वाली इस प्रजाति को ग्रामीण अंचल में कसोढ़ का वृक्ष कहा जाता है। तेज धूप में, तेज बढ़वार लेने वाली इस प्रजाति की औसत ऊंचाई 18 मीटर तक देखी गई है। प्रारंभिक अवस्था में सिंचाई की जरूरत होती है लेकिन औसत ऊंचाई के हासिल कर लेने के बाद यह अनिवार्यता नहीं होगी।

रोकता है मिट्टी कटाव

कसोढ़ का वृक्ष अपनी मजबूत जड़ों की वजह से तेज जल प्रवाह में मिट्टी को बहने से रोकने में सक्षम पाया गया है। यह गुण नदी तट पर खेती करने वाले किसानों की समस्या से हमेशा से छुटकारा दिलाने वाला है, जो बारिश के दिनों में खेतों के नदी में समा जाने जैसी विकराल समस्या से जूझ रहे हैं।

सुधारता है बिगड़े वन

अनुसंधान में कसोढ़ को बिगड़ चुके वनों को सुधारने के भी गुण मिले हैं। अल्प सिंचाई में तैयार होने वाली यह प्रजाति खराब हो चुकी भूमि को उर्वर बनाने में सहयोग देती है। यह गुण उस वन विभाग की चिंता दूर करेगा, जो बिगड़े वनों को सुधारने के प्रयास के बाद भी अपेक्षित सफलता से दूर है।

हो रहे पौधे तैयार

अनुसंधान में मिली सफलता के बाद वन विभाग के रोपणियों में पौधे तैयार किए जाने लगे हैं। निजी क्षेत्र की नर्सरियों में भी बड़ी संख्या में पौधों की उपलब्धता देखने में आएगी। विभाग मानकर चल रहा है कि रोड साइड प्लांटेशन में कसोढ़ का पेड़ शीर्ष स्थान पर होगा।

तेजी से बढ़ने वाला सजावटी वृक्ष

यह मध्यम आकार का सदाबहार तेजी से बढ़ने वाला सजावटी वृक्ष है। इसकी पत्तियां, जड़े, फल, फूल, तना और बीज औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग की जाती है। पत्तियों का उपयोग खाद के रूप में किया जाता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर