अद्भुत है कपोक का वृक्ष

रोपण के लिए तैयार हो रहे पौधे

सतीश अग्रवाल

बिलासपुर। पाला के मौसम में भी हरा-भरा रहता है। सूखे दिनों में लगने वाली आग भी इसे जला नहीं पाती। इतना ही नहीं, शायद इकलौता ऐसा वृक्ष होगा, जो जलोढ़ भूमि में भी तैयार हो जाता है।

बेहद अद्भुत है कपोक का वृक्ष। पौधरोपण की हो रही तैयारियों के बीच, अब कपोक की भी सुध ली जा रही है। आसानी से पौधे मिल जाएं, इसके लिए नर्सरियों में कलम और बीज से नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बरसों बाद पहली बार पौधरोपण को लेकर हैरत में डालने वाला रुझान देखा जा रहा है।

जानिए कपोक को

बीज और कलम तकनीक से पौधे तैयार किए जा रहे हैं। 4 से 10 महीने की उम्र में पौधे रोपित करने लायक माने गए हैं। वानिकी वृक्षों की प्रजातियों में कपोक को सबसे कम देख-रेख की जरूरत होती है। प्रकाश पसंद करने वाली यह प्रजाति जलोढ़ भूमि में अच्छी बढ़वार लेती है। ऐसी भूमि जहां जल निकास की व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती, वहां भी यह तेजी से बढ़ता है।

इसलिए अद्भुत

प्रकाश पसंद करने वाली यह प्रजाति कड़ाके की ठंड और पाला को सहन कर सकती है। इतना ही नहीं, सूखे दिनों में लगने वाली आग इसकी हरियाली छीन नहीं सकती। कॉफी और कोकोआ के बागान में इसकी जरूरत छाया वृक्ष के रूप में पड़ती है। इसलिए इसका उपयोग क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है।

देता है यह लाभ

महज 3 से 8 वर्ष की उम्र में इसके फल तैयार हो जाते हैं। जिससे निकलने वाले रेशे पैकिंग, कुशन, तकिया बनाने के काम में आते है। बीज भी उपयोगी माने जाते हैं। लकड़ियों की खरीदी माचिस, हल्का प्लाईवुड, कंटेनर, पैकिंग बॉक्स, ब्रश हैंडल बनाने वाली इकाईयां करती है। छाल से निकलने वाले गम का उपयोग औषधि बनाने वाली यूनिटें करतीं हैं।

पहचान इस नाम से भी

सिब्रा पेंटेण्ड्रा प्रजाति के कपोक को अपने छत्तीसगढ़ में सेमल के नाम से जाना जाता है। उपयोग क्षेत्र में इसकी पहचान कपोक के अलावा सिल्क कॉटन और सफेद सेमल के नाम से होती है। भारत के अलावा इसके वृक्ष इंडोनेशिया और अमेरिका में बहुतायत में मिलते हैं।

तेजी से बढ़ने वाला अद्भुत वृक्ष

कपोक एक तेजी से बढ़ने वाला और बहुत सारे गुणों से भरपूर एक अद्भुत वृक्ष है । इसकी लकड़ी का उपयोग माचिस की तीली, हल्के प्लाईवुड कंटेनर तथा ब्रश के हैंडल बनाने के लिए किया जाता है । इसके फल से प्राप्त रुई का उपयोग तकिए, गद्दे तथा जीवन रक्षक एवं अन्य जल-सुरक्षा उपकरण बनाने में भी किया जाता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज आफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर