11 राज्यों में हो रही खेती
बिलासपुर। सुबबूल। एकमात्र ऐसा वृक्ष जो पूरे साल फूल, फल और बीज देता है। दिलचस्प यह कि किसी भी प्रकार की मिट्टी में तैयार हो जाता है। बेहद कम अवधि में तैयार होने वाली यह प्रजाति देश के 11 राज्यों में फैल चुकी है। इसमें अपना छत्तीसगढ़ भी है, जहां इसका उपयोग घरेलू जरूरतें पूरी करने में हो रहा है।
पौधरोपण के लिए चुनी जाने वाली प्रजातियों की सूची से सुबबूल का नाम भले ही बाहर हो लेकिन जितनी जगह इसे मिल रही है, वह स्वीकार्यता का बड़ा प्रतीक माना जा चुका है। यही वजह है कि सुबबूल बाड़ी और खेतों में ही नहीं, घर के आंगन में भी नजर आ रहा है। खेतों और बाड़ियों में यह जिस तेजी से फैलाव ले रहा है उससे ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतें आसानी से पूरी हो जा रहीं हैं।

पूरे साल यह प्रक्रिया
सुबबूल शायद एकमात्र ऐसा वृक्ष होगा जिसमें पूरे साल पुष्पन, फल्लियां और बीज लगने की प्रक्रिया चलती है। और हां, सर्वाधिक बीज देने का कीर्तिमान भी सुबबूल ने बनाया हुआ है। बताते चलें कि इसके 1 किलो बीज में 3000 दाने होते हैं। दिलचस्प यह कि बीज 3 से 4 साल तक जीवित रहते हैं।

हर प्रकार की मिट्टी में
स्वाइडर, सल्वाडोर और पेरू नाम की तीन प्रजातियों में उपलब्ध सुबबूल की हर प्रजाति दोमट, रेतीली और चिकनी मिट्टी में तैयार हो जाती है लेकिन उचित जल निकास और उनमें उच्च पीएच मान वाली मिट्टी में सुबबूल अच्छी बढ़वार लेता है। गहरी मृदा भी इस प्रजाति को बेहद पसंद है। पाला के प्रति इसे संवेदनशील माना गया है।

यह राज्य अव्वल
उपयोग और मांग क्षेत्र बढ़ने के बाद देश के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में इसकी व्यावसायिक खेती की जा रही है। अपने प्रदेश में फिलहाल इसका उपयोग ईंधन और घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए हो रहा है।

उपयोग क्षेत्र
महज 4 साल की उम्र में उपयोग करने के लायक हो जाने वाला सुबबूल की मांग पल्प इंडस्ट्रीज में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा कोयला का उपयोग करने वाली इकाईयां भी इसकी लकड़ी की मांग क्षेत्र में हैं क्योंकि इसमें कैलोरीमिक मांग 3900 प्रति किलो कैलोरी प्रति किलो ग्राम से लेकर 4640 प्रति किलो तक होता है।

रहता साल भर हरा-भरा
सुबबूल कम पानी एवं देखरेख पर भी तेजी से बढ़ता है। यह साल भर हरा रहता है l एक बार लगा देने पर यह तेजी से फैलता है । इसका उपयोग ईंधन एवं बायोमास के लिए बहुत उपयोगी पाया गया है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
