ज्वार का भी मिल रहा इडली, दोसा
बिलासपुर। अब ज्वार का दोसा और इडली बनाया जा सकेगा। मिलेट मिशन की जैसी शुरुआत हुई है और जिस तरह प्रमुख शख्शियतें पैरवी कर रहीं हैं, उससे मोटा अनाज की यह प्रजाति भी अपनी पहुंच बना रही है।
खान-पान के क्षेत्र में परिवर्तन की बयार आ रही है। इसे आसानी से समझना है, तो मोटा अनाज की बढ़ती हिस्सेदारी से समझा जा सकता है। पुरखौती मुक्तांगन के बाद मोटे अनाज से बनने वाली खाद्य सामग्री का बनाया जाना स्वयंसेवी समूहों ने भी चालू कर दिया है। जैसा प्रतिसाद मिल रहा है, उसे देखते हुए निजी क्षेत्रों में भी ज्वार का इडली और दोसा बनाने और परोसने के संकेत मिलने लगे हैं।

परंपरागत मसाले का उपयोग
सुबह के नाश्ते में जो खाद्य सामग्रियां बनाई और बेची जा रही हैं, उनमें ज्वार का इडली और दोसा बिल्कुल नया होगा। परंपरागत मसालों की ही मदद से बनाई जा सकेगी ज्वार की यह सामग्रियां। संस्थानें प्रयास कर रही हैं और उपभोक्ता रुझान जानने की भी कोशिश में है। संकेत सकारात्मक मिल रहे हैं।

होते हैं यह तत्व
ज्वार में मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन की मात्रा भरपूर होती है। यह औषधीय तत्व इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत रखने में सहायक माने गए हैं। ग्लूटेन-फ्री होने की वजह से इससे कई तरह की खाद्य सामग्रियां बनाई जा सकती हैं। नियमित आहार में शामिल करने पर ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रण में रहता है और कोलेस्ट्रॉल सामान्य बनाए रखने में मदद मिलती है।

साइड इफेक्ट नहीं
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के रिटायर्ड एग्रोनॉमी साइंटिस्ट डॉ एस आर पटेल का कहना है कि खान-पान की शैली में मोटा अनाज से बनी सामग्रियों की मौजूदगी अच्छा संकेत हैं। ज्वार से रोटी तो पहले से ही बनती रही है। अब इडली और दोसा को लेकर होते प्रयास, मिलेट मिशन की ओर बढ़ता कदम स्वागतेय है।
