नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती से बांस को मिला बाजार



बिलासपुर। सख्ती ही कहिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की, जिसकी वजह से लगभग 3 दशक बाद पर्यावरण हितैषी बांस की वापसी हो रही है। प्लास्टिक पर प्रतिबंध का फैसला जिस अंदाज में लिया गया है, वह उन किसानों के लिए वरदान है, जिनकी रोजी-रोटी बांस की ही खेती से चला करती थी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का फैसला और राष्ट्रीय बांस मिशन की पहल के बाद 90 के दशक में खेतों से गायब हो चुके बांस को नया जीवन मिलने जा रहा है। इसके बाद नए रंग-रूप और नए कलेवर में आएगा बांस की सामग्रियों का बाजार। पहला प्रयास ” वाटर बॉटल” के रूप में निश्चित ही हैरत में डालेगा क्योंकि इसे पूरी तरह सुरक्षित माना जा रहा है। कीमत भले ही ज्यादा मानी जाएगी लेकिन बाजार का प्रारंभिक रुझान बेहतर प्रतिसाद देने वाला माना जा रहा है।

इसलिए वापस

प्लास्टिक के सामान जिस तरह पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं उसे देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बेहद सख्ती के साथ चरणबद्ध तरीके से प्लास्टिक के सामानों पर प्रतिबंध का आदेश दिया हुआ है। निर्माण और विक्रय पर अर्थदंड और सजा जैसे प्रावधान किए जाने की वजह से बांस से बनी सामग्रियों की मांग बढ़ती नजर आती है। इसी के साथ बढ़ रही है बांस की मांग, जिसने इसकी खेती का बंद रास्ता फिर से खोल दिया है।

मिशन आया फिर सामने

राष्ट्रीय बांस मिशन एक बार फिर से हरकत में आ गया है। कार्य योजनाओं के सहारे उसने बांस की खेती करने वाले किसानों तक पहुंच बनाने की तैयारी कर ली है। कुछ ऐसी नई योजनाएं इस बार खेतों तक पहुंचेगी, जिनकी मदद से बांस का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। विभिन्न प्रजातियों के बांस के बीज, कटिंग और राइजोम जैसे साधन किसानों तक आसान पहुंच का माध्यम बनने जा रहे हैं। बताते चलें कि एक बार की बोनी के बाद लगातार 30 से 40 साल तक यह साथ देते हैं।

संगम पुराना और नया का

सूपा, पर्रा, टोकना, बास्केट, कंटेनर, हल, पाटा और बेलन पहले से ही बनते रहे हैं लेकिन बांस से बने शिल्प से इसे जो ख्याति मिली है, उसके बाद पहली बार वाटर बॉटल भी नजर आएगा। चम्मच और स्टिक भी आने की पूरी तैयारी में हैं। यह इसलिए क्योंकि पर्यावरण हितैषी सामग्रियों की मांग बढ़ रही है।

योजना उत्पादन क्षेत्र बढ़ाने की

राष्ट्रीय बांस मिशन के अनुसार देश में मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, त्रिपुरा, असम, नागालैंड और गुजरात में बांस की व्यावसायिक खेती हो रही है। मांग क्षेत्र जिस तरह अपना दायरा बढ़ा रहा है उसके बाद ऐसे राज्यों में भी खेती की योजना है, जहां इसकी फसल ली जा सकती है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

खेती-किसानी को मुनाफे वाला काम बनाने की लगातार कोशिश की जा रही है। इसी कड़ी में ऐसी फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है जो कम लागत में ज्यादा मुनाफा दे सकती है। यही वजह है कि किसानों के बीच बांस की खेती का चलन तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रीय बांस मिशन के माध्यम से बांस की खेती के लिए मदद की जा रही है।
– डॉ अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री, टीसीबी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर