वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की बहुचर्चित किताब गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल पर पत्रकार सुदीप ठाकुर की टिप्पणी

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के दिवंगत वामपंथी चिंतक लेखक रमेश याज्ञिक 1980-90 के दशक में देशबंधु में एक कॉलम लिखा करते थे, जो आम तौर पर उनकी यात्राओं के अनुभव पर केंद्रित होते थे। इस बहाने वे सामाजिक संरचना से लेकर राजनीतिक विमर्श तक कर डालते थे। इसके साथ ही उसमें छोटे-छोटे प्रसंग भी आ जाते थे, जिनमें कई छोटे-बड़े किरदार भी सहजता से चले आते थे। यह कॉलम यात्री के पत्र के नाम से छपा करता था और बाद में यह दो खंडों में पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुआ, पहला ‘यात्री के पत्र’ के नाम से और दूसरा ‘जगहें और लोग’ के नाम से। चिंतक पत्रकार-लेखक उर्मिलेश की बहुचर्चित किताब गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल को पढ़ते हुए अनायास उनका कॉलम और उनकी किताब का शीर्षक याद आ गया।

दरअसल किताबें पढ़ना यात्रा में होने जैसा ही तो है। कई बार यात्राएं ऐसी भी होती हैं, जिनमें आप खुद नहीं होते, लेकिन आप को सहयात्री जैसा एहसास होता है। उर्मिलेश की किताब भी किसी यात्रा के अनुभव जैसी है, मगर यह सीधी-सपाट यात्रा नहीं है। इसमें पथरीले और उबड़-खाबड़ रास्ते भी हैं। असहज और झकझोर कर रख देने वाले पड़ाव भी हैं। और इन सबके साथ उर्मिलेश के पत्रकार-लेखक मन के चुभते सवाल भी हैं।

अव्वल तो किताब का शीर्षक गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल चौंकाता है। गाजीपुर उत्तर प्रदेश का पिछड़ा जिला जरूर है, लेकिन ऐतिहासिक कारणों से यह अहम रहा है। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार अमिताव घोष के उपन्यास सी ऑफ पपीज अफीम युद्ध पर केंद्रित है और इसमें गाजीपुर का जिक्र बार-बार आता है, जहां अफीम की फैक्टरी थी। उर्मिलेश भी 1820 में स्थापित किए गए अफीम कारखाने का जिक्र करते हुए लिखते हैं, हमारी सुबहें सूरज उगने के या मुर्गे की बांग से नहीं, इस फैक्टरी के सायरन की आवाज से होती थी। वह गाजीपुर के विकास गाथा का जिक्र करते हुए बताते हैं कि यह कभी हथकरघा और इत्र गुलाब उद्योग का भी केंद्र था। गाजीपुर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी 1927-28 में डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी के रूप में एक राष्ट्रीय अध्यक्ष दिया। इसी गाजीपुर में, जैसा कि उर्मिलेश लिखते हैं, ‘साम्राज्यवाद और फासीवाद के धुर विरोधी लेखक विचारक और बौद्धिक योद्धा’, क्रिस्टोफर कॉडवेल पर भारत में पहली पीएचडी की गई। कॉडवेल ब्रिटेन के रहने वाले थे और महज 29 वर्ष की उम्र में 20 अक्तूबर, 1907 को उनका निधन हो गया। उन पर यह पीएचडी गाजीपुर के अंग्रेजी के प्राध्यापक पी एन सिंह ने की थी। उर्मिलेश ने जिस तरह से कॉडवेल और पी एन सिंह को याद किया है, वह अपने शहर से जुड़ी स्मृतियों को सहजने का अनूठा तरीका है। इसके साथ ही वह यह सवाल करने से गुरेज नहीं करते कि गाजीपुर मूल के प्रो मूनीस रजा और पड़ोसी जिले बनारस के मूल निवासी डॉ. नामवर सिंह की नजर में पी एन सिंह जैसे प्रखर शिक्षक क्यों नहीं आए? यह उस दौर की बात है, जब नामवर सिंह ने यूपी-बिहार-राजस्थान-मध्य प्रदेश से कई लोगों को जेएनयू, दिल्ली विवि, जामिया या देश के कई अन्य संस्थानों में नियुक्त कराया था।
वैसे खुद उर्मिलेश का अनुभव नामवर सिंह के साथ बहुत सहज नहीं रहा। इसका एहसास किताब के एक अध्याय के शीर्षक, ‘जेएनयू के वामाचार्य और एक अयोग्य छात्र के नोट्स’ से हो जाता है। नामवर सिंह के साथ 1978-79 के दौरान के अपने जिस अप्रिय अनुभव को उन्होंने किताब में दर्ज किया है, वह हमारे समाज की आज भी कटु सच्चाई है। नामवर सिंह ने उन्हें ठाकुर समझा था! किसी सिलसिले में नामवर सिंह जानना चाहते थे कि आखिर वह किस जाति के हैं।

जेएनयू के अपने अनुभवों को उर्मिलेश ने विस्तार से लिखा है, जिसमें गोरख पांडे से उनकी अंतरंगता से जुड़े प्रसंग, असमय चले गए इस कवि के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करते हैं। यह किताब दरअसल उर्मिलेश के निजी संस्मरणों पर केंद्रित है, इसलिए इसमें ढेर सारे किरदार आते जाते हैं, जिनमें राजेंद्र यादव, महाश्वेता देवी, तुलसीराम, सुरेंद्र प्रताप सिंह, राजेंद्र माथुर से लेकर एम जे अकबर, दीनानाथ मिश्र और राइजिंग कश्मीर के दिवंगत संपादक शुजात बुखारी तक शामिल हैं, जिनकी 2018 में हत्या कर दी गई थी।

उर्मिलेश प्रिंट और टीवी के कई बड़े संस्थानों में अहम पदों पर रहे हैं, और देश-विदेश में खूब घूमें हैं, तो ये सारे अनुभव भी किताब के पन्नों में दर्ज होते चले गए हैं। इसके साथ वह हमारे समाज की जटिलताओं और सामाजिक संरचनाओं से जुड़े सवाल भी उठाते चलते हैं।

चूंकि उर्मिलेश मूलतः पत्रकार हैं, लिहाजा लोगों को घटनाओं को और जगहों को देखने का उनका अपना नजरिया है। नामचीन लोगों को देखने का एक नजरिया वह होता है, जो दूसरों के अनुभवों पर आधारित होता है, और एक अनुभव होता है, जो उनसे रू-ब-रू होने पर होता है। इस किताब को पढ़ते हुए बार-बार इस तरह के अनुभव से गुजरना पड़ता है और कई धारणाएं टूटती जाती हैं।