राष्ट्रीयकरण-निजीकरण-दरबारी पूजीवाद
जे. के. कर
महराजा की घर वापसी हो गई है. Air India फिर से टाटा समूह को वापस मिल गया. आज की मुख्य खबर यही है. इस खबर से हमें कोई परेशानी नहीं है. हम तो सिर्फ सिक्के के दूसरे पहलू को पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जिसे नज़रअंदाज कर दिया गया है. इसके लिये हमें वक्त को इतिहास के उस पड़ाव पर ले जाना पड़ेगा जहां से भारतवर्ष का निर्माण शुरू हुआ था.
जब देश आजाद हुआ तो देश के उद्योग घरानों के पास इतनी संपदा नहीं थी कि आधारभूत संरचना का निर्माण कर सके. उस समय 1950 में संसद ने औद्योगिक नीति का प्रस्ताव गृहित किया. जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र को करदाताओं के पैसे से देश का विकास करना था. यह नेहरूकालीन बात है. उसके बाद इंदिरा गांधी ने कई निजी बैंक, बीमा कंपनियों तथा कोयला खदान आदि का राष्ट्रीयकरण किया. बेशक, नेहरू तथा इंदिरा समाजवाद की बात करते थे परन्तु उनकी नीतियां राजकीय पूंजीवाद के ज्यादा निकट थी.
हां, उस दौर में लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिली तथा रोजगार भी मिले. मसलन याद कीजिये उन दिनों को जब नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद बैंक में PF & Gratuity का पैसा जमा रखकर 10 से 12 फीसदी तक के ब्याज मिल जाया करते थे तथा जिदगी आराम से कट जाया करती थी.
इस दौरान भारतीय उद्योग घरानों ने इतनी संपदा जमा कर ली कि अब उसकी नज़र जनता के करों से प्राप्त पैसों से बनी आधारभूत संरचना पर पड़ी. इसके बाद 1991 में नरसिंम्हा राव सरकार ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय निजी क्षेत्र को नेतृत्वकारी भूमिका में आने दिया गया. यहीं से भारत की अर्थव्यवस्था राजकीय पूंजीवाद की राह छोड़कर निजीकरण व वैश्वीकरण की जनविरोधी राह पर चल पड़ी.
वहां से आज हम जिस समय में जी रहे हैं उसे दरबारी पूजीवाद का युग कहा जाता है. रैगन-थैचर के समय नारा दिया गया कि सरकार शासन करने के लिये है न कि व्यापार. बाद में इसकी परिणिति यह हुई कि व्यापारी शासन की नीतियां तय करने लगे. इस तरह से सरकारों द्वारा जो नीतियां बनाई जाती रही वह आमजन को सामने रखकर नहीं बाज़ार को लाभ पहुचाने के उद्देश्य की जानी लगी. नतीजन बेरोजगारी और मंहगाई सुरसा के मुंह के समान बड़ी होती गई. अर्थव्यवस्था के इस रूप ने समाज पर भी विपरीत असर डाला.
हम “महराजा की घर वापसी” की बात कर रहे थे. बेशक टाटा समूह बेहतरीन घराना है परन्तु हम आपका ध्यान इस बहाने देश के औद्योगिक-आर्थिक-सामाजिक व राजनीतिक विकास यात्रा पर लाना चाहते थे. इससे आपकों हम सब का भविष्य समझने में आसानी होगी क्योंकि हर 5 साल में हम सबको किसे साहिबे-मसनद बनाना है यह तय करने का मौका दिया जाता है.
“महराजा की घर वापसी” के साथ हमें यह भी देखना है कि हमारा खुद का घर भी ठीक से चले.

