इलेक्ट्रिक और टेराकोटा के दीए से मायूस कुम्हार

बिलासपुर। हताश हो चले हैं कुम्हार क्योंकि मिट्टी के दीए में मांग और रुझान आहिस्ता-आहिस्ता घट रही है। इसलिए बेहद सीमित मात्रा में दीये बनाए जा रहे हैं।

ग्रीष्मकालीन बाजार अपेक्षा से कहीं ज्यादा बेहतर रहा मिट्टी के घड़ों में लेकिन दीपावली पर विशेष रहने वाले मिट्टी के दीए अपेक्षित नहीं रहने की आशंका बलवती हो चली है क्योंकि बीते कुछ सालों से इलेक्ट्रिक और टेराकोटा के दीए का बाजार जबरदस्त बढ़ा हुआ है। यह स्थिति इस बार भी बनने की पूरी संभावना है।

पहुंचा दीया लेकिन…

नवरात्रि शुरू। स्ट्रीट साईड में दुकानें नजर आने लगीं हैं। परंपरागत संस्थानों में भी मिट्टी के दीए पहुंच गए हैं लेकिन खरीदी तो दूर, पूछ-परख अब तक शुरू नहीं हो पाई है। कीमत भले ही 150 से 200 रुपए प्रति सैकड़ा पर स्थिर लेकिन ठहरी हुई यह कीमत भी स्वीकार्यता से दूर है। ऐसा ही हाल धूप दान का भी है, जिसकी कीमत 25 से 50 रुपए पर शांत है।

हताश कुम्हार

परंपरागत दीया की खरीदी को लेकर रुझान जिस तरह घट रहा है, उसके बाद कुम्हार अब हताश हो चले हैं। इसलिए अपेक्षित से कम मात्रा में ही दीया का निर्माण किया है। निराशा इसलिए भी बढ़ती नजर आ रही है क्योंकि विक्रेता संस्थानों से भी उत्साहजनक खरीदी के ऑर्डर में कमी देखी जा रही है। बताते चलें कि ऐसे कुम्हारों की संख्या कम हो चली है, जो मिट्टी के दीए बनाते रहे हैं।

यहां जोरदार मांग की संभावना

टेराकोटा के दीए और इलेक्ट्रिक दीया तथा झालर की खरीदी दीपावली के लिए थोक बाजार ने पूरी कर ली है। नवरात्रि के फौरन बाद संस्थानों में नजर आने लगेंगी, यह तीनों सामग्रियां। 30 से 40% वृद्धि की संभावना इसलिए बन रही है क्योंकि कीमत बीती दीपावली जैसी ही है और खरीफ की फसल तब बाजार में आ चुकी होगी। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र की मांग विशेष रहेगी।