छत्तीसगढ़ से विदाई की तैयारी



बिलासपुर। मजबूत संरक्षण मांग रहा है लसोड़ा क्योंकि छत्तीसगढ़ में अब इसके वृक्ष तेजी से कम हो रहे हैं। यह तब, जब आयुर्वेदिक औषधि निर्माण इकाइयों की मांग इसकी छाल, पत्तियों और फलों में लगातार बढ़ रही है।

विलुप्ति की सूची में तो नहीं लेकिन समाप्त होने की राह पर है लसोड़ा का वृक्ष। वानिकी वैज्ञानिकों के बीच कार्डिया डाईकोटोमा नाम से पहचाने जाने वाले लसोड़ा की मांग दिन-प्रतिदिन इसलिए बढ़ रही है क्योंकि इसे अस्थमा, अपच, सूजन, माइग्रेन और डायरिया जैसी शारीरिक व्याधियों को दूर करने में सक्षम पाया गया है। यही वजह है कि औषधि निर्माण इकाइयों के बीच इसे डॉक्टर ग्रीन के नाम से संबोधित किया जाता है।

हर भाग अहम

बेहद कोमल होता है तना। सूखने पर सख्त हो जाता है। लकड़ियों से कृषि उपकरण तो बनते ही हैं साथ ही बंदूक के कुंदे भी बनाए जाते हैं। छाल से बनाए जाने वाला काढ़ा डायरिया ठीक करता है, तो घाव को शीघ्र भरने में मदद मिलती है। पत्तियों का लेप माइग्रेन से राहत दिलाता है। यही वजह है की छाल और पत्तियों की मांग सबसे ज्यादा है।

फल में यह गुण

अधपके फल से सब्जियां बनाने का चलन ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा है क्योंकि श्रम शक्ति को बरकरार रखती है सब्जी। पका हुआ फल गूदेदार होता है। इससे बनाया जाने वाला सिरप कफ और खांसी को खत्म करता है। इसलिए कफ सीरप बनाने वाली ईकाइयां फलों की खरीदी को प्राथमिकता देती हैं लेकिन उपलब्धता तेजी से घट रही है।

इसलिए संरक्षण

विलुप्ति की राह पर तो नहीं लेकिन मानव जनित दबाव में आ चुका लसोड़ा का वृक्ष अब छत्तीसगढ़ से विदा लेता नजर आ रहा है। यह तब, जब जलवायु और मिट्टी की प्रकृति अपने प्रदेश में लसोड़ा के लिए उपयुक्त है। शेष भारत में भी यह पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में ही बचे रह गए हैं  जबकि उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।

गुणों की खान है लसोड़ा

लसोड़ा को देश के दुर्लभ फलों की श्रेणी में रखा गया है। इस फल का दुर्लभ होने का एक कारण यह भी है, कि यह धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं और उनके नए पेड़ नहीं लगाए जा रहे हैं। दिखने में भले यह फल छोटा होता है, लेकिन इसके अनगिनत स्वास्थ्य लाभ होने के कारण इसे डॉक्टर ग्रीन कहा जाता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर