सतीश अग्रवाल
भाटापारा। पैड़ी ट्रांसप्लांटर। यह उस मशीन का नाम है ,जो रोपाई करती है। किसानों के बीच इसलिए चर्चा का विषय बन रही है क्योंकि कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए कृषि क्षेत्र को भी, जारी गाईडलाइन का पालन करना अनिवार्य होगा।
खरीफ सत्र की चल रही तैयारियों के बीच 8 साल बाद, एक बार फिर पैडी ट्रांसप्लांटर की चर्चा हो रही है। श्रम संकट तो एक वजह थी ही , और भी दूसरे कारण थे, पैड़ी ट्रांसप्लांटर बनाने और किसानों के बीच पहुंचाने के। प्रारंभिक दिनों में रुझान तो बढ़िया रहा लेकिन जाने क्यों किसानों ने इसे सिरे से नकार दिया। अब एक बार फिर, इसकी ना केवल चर्चा हो रही है बल्कि कृषि उपकरण संस्थानों में पूछ-परख होती नजर आ रही है।
इसलिए पैडी ट्रांसप्लांटर
कोरोना संक्रमण के दौर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कृषि क्षेत्र के लिए जो गाईडलाइन जारी की है, उसका असर रोपाई पर सबसे पहले पड़ सकता है। 2 गज की दूरी, भीड़-भाड़ पर नियंत्रण व्यावहारिक दृष्टि से संभव नहीं है। इसलिए पैडी ट्रांसप्लांटर की ओर किसान जा सकता है क्योंकि यह मशीन केवल 3 श्रमिकों की मदद से रोपाई कर सकती है।
यह है पैडी ट्रांसप्लांटर
डीजल से चलने वाला पैडी ट्रांसप्लांटर 2 घंटे में 1 एकड़ रोपाई करने में सक्षम है। इस काम में प्रति घंटा 600 ग्राम, डीजल की खपत संभावित है। एक बार में चार से आठ कतार में पौधरोपण करता है। केवल 3 श्रमिकों की मदद से किये जाने वाले इस काम में यह मशीन समान दूरी में पौधों का रोपण करती है। इससे ग्रोथ अच्छी मिलती है और उत्पादन भी बढ़ता है।
होंगे यह लाभ
पैडी ट्रांसप्लांटर से रोपाई करने पर मात्र 3 या 4 श्रमिक की जरूरत होगी जबकि परंपरागत तरीके से इस काम में 15 से 20 श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। इससे मजदूरी पर होने वाला व्यय बचाया जा सकेगा। प्रति एकड़ समय भी कम लगेगा। निंदाई और बियासी पर होने वाला खर्च बचाया जा सकेगा। सबसे बड़ा लाभ यह कि कोरोना गाईडलाइन का पालन पूरी तरह पक्का किया जा सकेगा।
पैडी ट्रांसप्लांटर को लेकर हो रही पूछ-परख निश्चित ही सुखद है। अपना काम करने के बाद किसान इसे किराए पर भी चला सकते हैं।
- प्रदीप अग्रवाल, संचालक ,ऋषभ ट्रैक्टर्स भाटापारा।


