कुल्लू अब केवल अचानकमार और रतनपुर के आसपास के जंगलों में

सतीश अग्रवाल

बिलासपुर । चांदनी रात में चमकता है, इसकी खूबसूरती की वजह से ही इसे लेडी लेग यानी गोरी मेम के पैर भी कहा जाता है। इस प्रजाति के वृक्ष का तना। भारी, बेहद भारी इसकी लकड़ियां बेहद मजबूत होती हैं। बस यही गुण कुल्लू की अकाल मौत का कारण बन रहा है। हैं देश में इसके पेड़ लेकिन छत्तीसगढ़ में यह प्रजाति विलुप्ती की कगार पर पहुंच गई है।

वानस्पतिक नाम है ‘ईस्टर कुलिया यूरेन’। पहचाना जाता है ‘कुल्लू का वृक्ष’ के नाम से। वन औषधि के क्षेत्र में पहचान व्यापक है लेकिन जो ख्याति इसकी गोंद ने दिलाई है, उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती। उन्नत औषधीय गुणों वाले गोंद की खरीदी साल- दर- साल बढ़ रही है लेकिन उत्पादन इसी क्रम में कम होता जा रहा है। अंधाधुंध कटाई, पहली और अंतिम वजह मानी जा रही है। लिहाजा पहली बार इसके पौधे वन विभाग की नर्सरियों के जरिए रोपण क्षेत्र में पहुंचाए जाएंगे।

अंधेरे में चमकता है तना

उच्च प्रकाश पसंद करने वाला ‘कुल्लू’ ,औषधि प्रजातियों के वृक्ष में जाना-पहचाना नाम है। छाल मोटी होती है। आंतरिक परत भले ही धूसर या गहरा लाल होता है लेकिन बाहरी परत सफेद और चमकदार होती है। यही वजह है कि चांदनी रात में इसे दूर से ही चमकता हुआ देखा जा सकता है।

देता है यह सामग्री

कुल्लू का वयस्क वृक्ष, प्राकृतिक तरीके से चिपचिपा स्त्राव छोड़ता है। सूखने पर गोंद के रूप में निकाला जाता है। खाद्य सामग्री के अलावा औषधि बनाने वाली ईकाइयां इसकी खरीदी हाथों-हाथ करतीं हैं लेकिन संग्राहक और वनोपज कारोबार सौदे में निर्यात को पहली प्राथमिकता देता है।

बेहद भारी, बेहद मजबूत

कुल्लू का पूर्ण वयस्क वृक्ष 15 मीटर तक ऊंचा होता है। चट्टानी दरारों, सूखी पथरीली धरती पर शीघ्र बढ़वार लेती है, यह प्रजाति। लकड़ियों का उपयोग ईंधन के रूप में होता है लेकिन बेहद भारी होने की वजह से परिवहन आसान नहीं होता। इसलिए गिराए गए स्थल पर ही काटा जाता है। यही वजह है कि इसकी अवैध कटाई बेतहाशा हो रही है।

बचे सिर्फ यहां

छत्तीसगढ़ में इसके वृक्ष केवल अचानकमार, रतनपुर और बरसाती नालों के आस-पास ही रह गए हैं। इसलिए कुल्लू को विलुप्त वृक्षों की सूची में रख लिया गया है। वन विभाग ने कार्य योजना बनाते हुए अपनी नर्सरियों में पौधे तैयार करने का काम चालू कर दिया है। योजना के अनुसार यहीं की नर्सरियों से होकर कुल्लू की पहुंच, रोपण क्षेत्र तक होगी। फिलहाल देश में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से कोंकण के जंगलों में यह प्रजाति मिलती है।

संरक्षण और संवर्धन आवश्यक

गोंद प्राप्ति के अवैज्ञानिक तरीके के कारण कुल्लू के प्राकृतिक वन धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। गोंद का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन और औषधि निर्माण में थिकनर के रूप में और डेंचर चिपकाने में किया जाता है। पेय एवं खाद्य पदार्थों में बाइंडर,इमल्सीफायर और स्टेबलाइजर के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
– अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर