फसलों को बंदरों से बचाने जमकर खरीदी
भाटापारा। बंदरों के उत्पात से फसल बचाने के बेहद सीधे और सरल उपाय पर भी महंगाई की नजर लग चुकी है। जी हां, बात हो रही है गुलेल की, जिसकी खरीदी, जिस मात्रा में हो रही है उससे चकित हैं बेचने वाले।
सीजन है दलहन और फलों का। अवसर है उन बंदरों के लिए, जिनकी नजर में यह फसलें आ चुकी हैं। घुमंतू मवेशियों से फसल बचाने के साधन तो काम आ रहे हैं लेकिन छलांग लगाकर फसलों पर धावा बोलने वाले बंदरों से बचने का कारगर उपाय किसानों के पास फिलहाल नहीं हैं। इसलिए गुलेल का सहारा लिया जा रहा है लेकिन यहां भी महंगाई से सामना करना पड़ रहा है।

हमला इन पर
अमरूद, सीताफल, बेर और बेल के वृक्षों में फल न केवल लगने चालू हो गए हैं, बल्कि इनकी फसल भी बाजार में आने लगी है। इसके साथ ही मटर, चना, तिवरा और बटरी की भी आवक हो रही है लेकिन तैयार होती यह फसलें सहज ही बंदरों का निशाना बन रहीं हैं। इधर शहतूत के फलों का लगना शुरू ही हुआ है। यह भी निशाने पर है।

बेअसर यह उपाय
फसल बचाने के परंपरागत उपाय पूरी तरह बेअसर हो चुके हैं। पटाखों की तेज आवाज अब भयभीत नहीं करती। कांटे भी बाधा नहीं बन रहे। यह इसलिए क्योंकि बंदरों का रास्ता पेड़ों से होकर गुजरता है या फिर खपरैल व पक्की छत रास्ता बनती है। ऐसे में बाड़बंदी से फसलों को बचा लेने के प्रयास बेमानी ही साबित हो रहे हैं।

गुलेल इस दर पर
मांग क्षेत्र जिस तरह विस्तार ले रहा है, उसके बाद प्लास्टिक, लकड़ी और स्टील से बने गुलेल की पहुंच बाजार में हो रही है। मांग के पहले क्रम पर लकड़ी से बने गुलेल ही हैं, जिसे 40 से 90 रुपए में खरीदा जा रहा है। दूसरे क्रम पर प्लास्टिक का गुलेल है, जिसमें रेंज 20 से 50 रुपए तक की है। तीसरे स्थान पर स्टील फ्रेम में आने वाली गुलेल है, जिसकी कीमत 120 से 150 रुपए प्रति नग बताई जा रही है।
बेहतर है मांग
गुलेल की कीमत में आंशिक तेजी आई है लेकिन इसका ज्यादा असर नहीं देखा जा रहा है क्योंकि खरीदी की मात्रा अच्छी निकली हुई है।
– भूपेंद्र वर्मा, संचालक, श्री स्पोर्ट्स, भाटापारा
