बारिश नहीं, बोनी में हो रही देरी
बिलासपुर। अब खेती पुराने अनुभवों से नहीं बल्कि मौसम आधारित निर्णयों से करनी होगी क्योंकि मानसून लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। ऐसे में देर से बोई जाने वाली एवं अल्प अवधि में तैयार होने वाली फसलें अपनानी होंगी।
खरीफ फसलों की बोनी में लगभग एक पखवाड़े का विलंब हो चुका है। चिंता में अब कृषि वैज्ञानिक भी आ चुके हैं।फौरी उपायों के बीच किसानों को कुछ ऐसी अहम सलाह दी जा रही है, जिसे अपनाकर नुकसान को कम किया जा सकता है। जिसमें मौसम आधारित खेती को सबसे अहम माना जा रहा है। उर्वरकों में फिलहाल यूरिया के छिड़काव से बचने की सलाह दी गई है।

मध्यम एवं अल्प अवधि वाली फसलें
धान की खेती में विशेष सावधानी रखने की सलाह देते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि दीर्घ अवधि वाली प्रजातियों की जगह मध्य एवं अल्प अवधि में तैयार होने वाली प्रजातियों का चयन करें। उर्वरकों का छिड़काव सोच समझकर करें। यह सतर्कता यूरिया के छिड़काव के पूर्व विशेष रूप से रखनी होगी क्योंकि नमी होने की स्थिति में यूरिया का छिड़काव नुकसान की बड़ी वजह बन सकता है।
करें बहुउद्देशीय एवं कृषि वानिकी खेती
बहुउद्देशीय खेती के लिए उड़द, मूंग, तिल, अरहर, कोदो, कुटकी, रागी और ज्वार की बोनी को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यह फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देतीं है। एग्रोफोरेस्ट्री में सहजन, करंज, नीम, शीशम, अर्जुन, महुआ, इमली, जामुन, और बांस का रोपण मेड़ों पर करने की सलाह इसलिए दी जा रही है क्योंकि यह प्रजातियां मिट्टी में नमी बनाए रखतीं हैं। ताप नियंत्रण करने के साथ-साथ जैव विविधता भी बढ़ाते हैं।

वर्षा जल ऐसे बचाएं
छत्तीसगढ़ में मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। यहां खरीफ मौसम की सफलता पूरी तरह दक्षिण पश्चिम विक्षोभ पर निर्भर है। बीते कुछ सालों से मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। मानसून की धीमी प्रगति, कम वर्षा और बीच-बीच में लंबे ‘ड्राई स्पेल’ की स्थिति ने खेती को प्रभावित किया हुआ है। लिहाजा खेत, तालाब, डबरी के साथ कंटूर बंडिंग जैसी विधियों पर गंभीरता के साथ काम करना होगा ताकि वर्षा जल को, खेतों में लंबी अवधि तक रोका जा सके।

मौसम आधारित कृषि किसानों की सुरक्षा
छत्तीसगढ़ में मानसून की अनिश्चितता अब अपवाद नहीं, बल्कि नई वास्तविकता बनती जा रही है। ऐसी स्थिति में किसानों को पारंपरिक खेती की बजाय मौसम आधारित कृषि रणनीति अपनानी होगी। यदि वर्षा में देरी हो तो अल्प एवं मध्यम अवधि वाली फसलों का चयन करें, खेत में नमी संरक्षण पर विशेष ध्यान दें और यूरिया का उपयोग पर्याप्त नमी उपलब्ध होने पर ही करें। कृषि वानिकी, बहुफसली खेती तथा खेत में वर्षा जल का अधिकतम संचयन किसानों को जलवायु जोखिम से बचाने का प्रभावी उपाय है। आज की परिस्थितियों में ‘एक फसल’ नहीं, बल्कि ‘लचीली और विविधीकृत खेती’ ही किसानों की आर्थिक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार बनेगी।
डॉ. दिनेश पांडे, सीनियर साइंटिस्ट (एग्रोनॉमी), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर