बिलासपुर। नुकसान पहुंचा सकती है जल भराव जैसी स्थितियां। जल निकास की व्यवस्था पक्की करें। जिन खेतों में रोपाई की संभावना नहीं है, वहां लेही विधि से बोनी करें।

बीते 24 घंटे से हो रही बारिश से अब खेतों में जल भराव जैसी स्थिति बनने लगी है। बोनी कर चुके किसान पौधों के डूबने से होने वाले नुकसान को लेकर चिंता में हैं तो ऐसे किसानों की संख्या भी बहुत है, जिन्होंने पर्याप्त बारिश की प्रतीक्षा में बोनी नहीं की है। ऐसे प्रभावित किसानों को जल निकास की व्यवस्था एवं लेही पद्धति से बोनी की सलाह दी जा रही है।

पक्की करें जल निकास की व्यवस्था

20 से 25 दिन की उम्र वाले पौधों को यह स्थिति नुकसान पहुंचा सकती है। लिहाजा जल भराव वाले खेतों में पानी की निकासी की उचित व्यवस्था फौरन करनी होगी ताकि पौधे सड़न और गलन से बचे रहें। यह व्यवस्था सब्जी फसल वाले खेतों में भी बनानी होगी। गहराई वाली खेतों में इसका न केवल ध्यान रखना होगा बल्कि निरंतर निगरानी भी करनी होगी।

… तो लेही विधि से करें छिड़काव

जिन खेतों में रोपाई संभव नहीं है वहां के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने लेही विधि से बोनी करने की सलाह दी है लेकिन जल भराव ऐसे खेतों में भी नहीं रहने देने की जरूरत बताई है। ऐसी स्थिति के लिए प्रजाति चयन के साथ उम्र का भी ध्यान रखना आवश्यक होगा क्योंकि वर्तमान स्थितियों में मौसम और वातावरण का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

निरंतर निगरानी आवश्यक

विलंब से आया दक्षिण पश्चिम मानसून कई तरह की समस्या को बढ़ाने वाला माना जा रहा है। इन्हीं में से एक है कीट प्रकोप की आशंका। बारिश और मौसम को देखते हुए ब्लास्ट, तना छेदक, पत्ती लपेटक जैसे जीवाणु जनित रोगों के फसलों में प्रवेश की आशंका है। लिहाजा फसलों की निरंतर निगरानी करने एवं समय-समय पर कृषि अधिकारियों व कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क करते रहने की सलाह दी गई है।

जल जमाव नहीं होने दें

बीते 24 घंटे से हो रही बारिश के बाद खेतों में जल निकास प्रणाली दुरुस्त करें। जिन खेतों में रोपा पद्धति से बोनी संभव नहीं है, वहां लेही विधि अपनाई जा सकती है।

डाॅ. एस आर पटेल, रिटायर्ड साइंटिस्ट, (एग्रोनॉमी) इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

कम समय में अत्यधिक वर्षा एक नई चुनौती

छत्तीसगढ़ में अब मानसून का स्वरूप बदल रहा है। कम समय में अत्यधिक वर्षा और लंबे शुष्क अंतराल कृषि के लिए नई चुनौती हैं। ऐसी स्थिति में किसानों की पहली प्राथमिकता खेतों से अतिरिक्त पानी की शीघ्र निकासी, मृदा संरक्षण और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन होनी चाहिए। भारी वर्षा के दौरान उर्वरकों एवं रसायनों का प्रयोग टालें तथा मौसम सामान्य होने पर ही वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार उनका उपयोग करें। गरज-चमक के समय खेतों में कार्य करने से बचें। भविष्य की सुरक्षित खेती के लिए कृषि वानिकी, वर्षा जल संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की आवश्यकता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर