बिलासपुर। शरीर का तापमान होता है 40 से 42 डिग्री सेल्सियस। बाहर का तापमान है 43 से 44 डिग्री सेल्सियस। शरीर से अतिरिक्त गर्मी नहीं निकाल पा रहे पक्षी। हीट स्ट्रेस के घेरे में आ चुके पक्षी अब हीट स्ट्रोक के एकदम करीब हैं।

35 से 40 डिग्री सेल्सियस जैसी सामान्य तनाव वाले स्थिति से आगे बढ़कर 42 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पहुंचने के बाद अब सांस लेना कठिन होने लगा है। भोजन कम लेने लगे हैं। खोज रहे हैं पानी और छायादार जगह। असफल साबित हो रही है यह खोज क्योंकि यह दोनों शहरी क्षेत्र से लगभग गायब हो चुके हैं।

हीट स्ट्रेस से हीट स्ट्रोक की ओर

शरीर के तापमान से बाहरी तापमान 2 से 3 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। चूंकि पक्षियों के शरीर में पसीने की ग्रंथियां नहीं होतीं इसलिए शरीर को ठंडा रखने के लिए तेज सांस लेना और हांफना, पंखों को फड़फड़ा कर हवा के जरिए शरीर को ठंडा रखने के प्रयास करते हैं पक्षी लेकिन बाहरी तापमान जिस अनुपात में बढ़ा हुआ है, उससे हीट स्ट्रेस के घेरे में आ चुके हैं। खतरा इसलिए ज्यादा है क्योंकि हीट स्ट्रोक जैसे तापमान के एकदम करीब हैं।

यहां खतरा सबसे ज्यादा

खुले मैदानी क्षेत्र, कांक्रीट वाले शहर, टीन की छतें और वृक्ष विहीन क्षेत्रों में हीट स्ट्रेस और हीट वेव जैसी आवृतियां तेजी से बन रहीं हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में लू की अवधि एवं तीव्रता दोनों बढ़ रही है। ऐसे में पक्षियों की भोजन श्रृंखला पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। यह स्थिति प्रजनन दर को भी प्रभावित कर रही है। हीट स्ट्रेस जैसी स्थितियां पक्षियों को न केवल पारंपरिक क्षेत्र को छोड़ने के लिए विवश कर सकतीं हैं बल्कि स्थानीय प्रजाति के पक्षियों की विलुप्ति की भी वजह बन सकती है।

संकट में यह प्रजाति

मौजूदा तापमान छोटे पक्षियों को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है क्योंकि उनका शरीर जल्द गर्म हो जाता है लेकिन गौरैया, मैंना, तोता और कबूतरों की जान को सबसे ज्यादा खतरा है क्योंकि 44 डिग्री सेल्सियस जैसा तापमान इनके लिए अत्यधिक तापमान माना जा रहा है। पक्षी वैज्ञानिकों में यह स्थिति चिंताजनक इसलिए मानी जा रही है क्योंकि पक्षी पर्यावरण संतुलन, परागण, बीज प्रसार और कीट नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत्यधिक तापमान की वजह से यदि इनकी संख्या घटती है तो सीधा प्रभाव कृषि, वन और मानव जीवन पर पड़ेगा।

शहरी हरियाली और जल स्रोत बढ़ाना समय की मांग

वर्तमान समय में बढ़ता तापमान केवल मानव स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पक्षियों के अस्तित्व के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। शहरी क्षेत्रों में तेजी से घटती हरियाली, जल स्रोतों का अभाव और कांक्रीटीकरण के कारण पक्षियों को प्राकृतिक आश्रय नहीं मिल पा रहा है। छोटे पक्षी अत्यधिक तापमान के प्रति संवेदनशील होते हैं। सार्वजनिक स्थलों में छायादार एवं स्थानीय वृक्षों का रोपण तथा शहरी हरित क्षेत्रों का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। पक्षियों का संरक्षण केवल जैव विविधता का प्रश्न नहीं बल्कि कृषि, पारिस्थितिकी और मानव जीवन की सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है।

अजीत विलियम, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर