सामान्य से कम होगी बारिश

बिलासपुर।  सामान्य वार्षिक वर्षा की तुलना में इस बार 6% बारिश कम हो सकती है। मानसून देर से आएगा और जल्द वापस हो जाएगा। बीच की अवधि में खंड बारिश की स्थिति बन सकती है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के बाद आकस्मिक कार्य योजना तैयार करके किसानों को ऐसी फसलों की बोनी करने की सलाह दी जा रही है, जो प्रतिकूल स्थिति में भी बेहतर पैदावार देती है। जल प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान रखने की सलाह किसानों को दी जा रही है।

औसत बारिश में 6% की कमी

सामान्य से 6% कम हो सकती है बारिश। देर से आएगा और जल्द वापस हो जाएगा मानसून। यह नया परिवर्तन खंड वर्षा के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के इस पूर्वानुमान के बाद तैयार आपात कार्य योजना के अनुसार मध्यम अवधि में तैयार होने वाली फसलों की बोनी को अहम माना जा रहा है। साथ ही रोपा पद्धति की बजाय सीधी बोनी जैसे उपाय की सलाह दी जा रही है। यह इसलिए क्योंकि सीधी बुवाई में 20% पानी की जरूरत कम पड़ती है।

ऐसे करें वर्षा जल संचयन

वर्षा जल संचयन अहम है। मेड़बंदी और खेत तालाब जैसी अस्थाई संरचनाएं अवश्य बनाएं। गांव स्तर पर वर्ष जल संचयन के लिए नाला, डबरी, तालाब और कुओं में वर्षा जल एकत्र करें। बरसाती नालों में रेत भरी बोरियों की मदद से अस्थाई रोक बांध बनाए जा सकते हैं। यह अस्थाई संरचनाएं वर्षा में लंबे अंतराल और सूखे जैसी प्रतिकूल स्थितियों में जीवन रक्षक सिंचाई की पक्की व्यवस्था बन सकतीं हैं। इसके लिए सूक्ष्म सिंचाई तकनीक की मदद ली जा सकती है।

जोखिम कम करेंगी यह फसलें

उच्चहन भूमि में धान की जगह अरहर, मूंग, उड़द जैसी फसलों को प्राथमिकता दें। तिलहन फसलों में मूंगफली, तिल, रामतिल, सोयाबीन और सूरजमुखी की बोनी बेहतर परिणाम देगी लेकिन इसके पूर्व खेतों और मेड़ों की सफाई जैसे काम अहम होंगे। कम वर्षा की स्थिति को देखते हुए रासायनिक उर्वरकों का छिड़काव सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जा रही है।

फसल विविधीकरण बनेगा किसानों का सुरक्षा कवच

मानसून देर से आए, बीच-बीच में लंबे अंतराल हों और वर्षा सामान्य से कम रहे, तो किसानों को केवल धान पर निर्भर रहने के बजाय फसल विविधीकरण को अपनाना चाहिए। खेत की मेड़ों पर बहुउद्देशीय वृक्ष लगाने से मिट्टी में नमी अधिक समय तक बनी रहती है, जल संरक्षण होता है, तापमान का प्रभाव कम पड़ता है तथा किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिलता है। वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई और सूखा-सहनशील फसलों के साथ वृक्षों का समन्वय भविष्य की जलवायु अनिश्चितताओं से निपटने का सबसे प्रभावी एवं टिकाऊ समाधान है।

डॉ. दिनेश पांडे, सीनियर साइंटिस्ट (एग्रोनॉमी), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर