रही सही कसर सरकारी फरमान और जांच पूरी कर रहे
भाटापारा। बूते से बाहर जा चुकी है धान की प्रति क्विंटल कीमत। प्रतिस्पर्धी हो चुका है पोहा का अंतरप्रांतीय बाजार। हताश हैं रोज आते नए-नए फरमान और रोज होती जांच से। ऐसे में पोहा मिलें कभी भी परिचालन से बाहर जा सकती है।
40 से 45 बरस का हो चुका है शहर का पोहा उद्योग। बीते चार दशकों में कई ऐसे मौके आए जिन्हें प्रतिकूल माना जाकर निपटा गया लेकिन पहली बार जैसी संकट की स्थिति बनी हुई है उसकी तो कल्पना भी नहीं थी। आशंका परिचालन रोकने की प्रबल हो चली है।

बेहद कमजोर आवक
शहर में 150 से 200 पोहा मिलें हैं। रोजाना 35 से 50000 कट्टा पोहा क्वालिटी के महामाया धान की जरूरत होती है नियमित उत्पादन के लिए लेकिन समर्थन मूल्य पर खरीदी की वजह से आवक मंडी प्रांगण में महज 3000 से 5000 कट्टा धान की ही है। संकट इसलिए भी गहराया हुआ है क्योंकि आवक और भंडारण पर प्रशासन की सख्ती जबर्दस्त है।

जवाब दे रही क्रय शक्ति
कमजोर आवक की वजह से 2700 से 3000 रुपए क्विंटल। पोहा क्वालिटी के महामाया धान की यह कीमत बहुत ज्यादा मान रहीं हैं पोहा मिलें। यह इसलिए क्योंकि यह भाव सीधे -सीधे न केवल उत्पादन की लागत बढ़ा रहा है बल्कि पोहा की कीमत भी बढ़ा रहा है। गहरा असर पोहा की घटती मांग के रूप में सामने है।

मुकाबला मध्य प्रदेश और गुजरात से
धान की बढ़ती कीमत की वजह से पोहा की कीमत का बढ़ना स्वाभाविक था। पोहा की यही बढ़ी हुई कीमत छत्तीसगढ़ के पोहे की मांग अंतरप्रांतीय बाजार में कमजोर कर रहीं हैं। आगे मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य हो चुके हैं जिनके उत्पादन की कीमत छत्तीसगढ़ के पोहे से काफी कम है।

संकट के साए में यह भी
प्रतिकूल स्थितियों का सामना कर रहीं इन पोहा मिलों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े 15 से 20 हजार कुशल और अकुशल श्रमिकों के भविष्य पर भी अनिश्चितता का खतरा मंडराता नजर आ रहा है। चिंतित वह वर्ग भी है, जिनका परिवहन कारोबार इन्हीं पोहा मिलों के दम पर चलता है।

धान में कमजोर आवक, तेज कीमत की वजह से पोहा में उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, लाभ का प्रतिशत घट रहा है। रही- सही कसर पोहा में प्रतिस्पर्धी माहौल पूरी कर रही है। यह स्थितियां नियमित संचालन को बाधित कर रहीं हैं।
-रंजीत दावानी, अध्यक्ष, पोहा मुरमुरा निर्माता कल्याण समिति, भाटापारा
