बिलासपुर। शार्टेज काली तिल में। आर्डर के बाद सप्लाई में 4 से 5 दिन का समय ले रहा है होलसेल काऊंटर। इन दोनों स्थितियों के बाद काली तिल रिकॉर्ड 400 रुपए किलो पर जा पहुंची है। ठीक पीछे है सफेद तिल, जो 200 रुपए किलो पर पहुंचकर आगे भी तेजी का संकेत रहा है।
सीजन और त्यौहार की मांग का दबाव तिल की सभी किस्मों में पड़ने लगा है। इसलिए पहली बार शार्टेज की स्थिति बनती नजर आ रही है। फलस्वरूप किलो पीछे 20 से 25 रुपए की तेजी आ चुकी है। आगत दिनों में फिर से इतनी ही तेजी की आशंका तिल बाजार व्यक्त कर रहा है।
दबाव में उत्पादक राज्य
गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश। इन राज्यों को तिल की व्यावसायिक खेती के लिए जाना जाता है। यह चारों पहली बार कमजोर फसल से रूबरू हो रहे हैं। दबाव तिल के लिए इस वजह से बना हुआ है क्योंकि सीजन और मकर संक्रांति की मांग देश स्तर पर निकली हुई है। इसके अलावा स्टॉकिस्टों की डिमांड पूर्व से ही बनी हुई है।

चौतरफा डिमांड
हेयर ऑयल बनाने वाली इकाईयां पहली बार संकट में हैं क्योंकि ऑयल क्वालिटी तिल की उपलब्धता भी बेहद कमजोर है। दूसरे नंबर पर लड्डू और पापड़ी बनाने वाले लघु उद्यमी हैं, जिनकी मांग मकर संक्रांति के लिए निकली हुई है। तीसरा उपभोक्ता वह क्षेत्र है, जो मौसम को देखते हुए तिल की खरीदी कर रहा है।
सप्लाई लाइन हो रही शाॅर्ट
उत्पादक क्षेत्र में कमजोर फसल के बावजूद डिमांड पूर्व स्तर पर बनी हुई है। फलस्वरुप होलसेल मार्केट ऑर्डर के 4 से 5 दिन के बाद सप्लाई दे रहा है क्योंकि स्टॉकिस्टों के पास तिल का स्टॉक तेजी से घट रहा है। उत्पादक राज्यों के पास वैसे भी तिल खत्म हो चुका है। इसलिए सप्लाई लाइन तेजी से शार्ट हो रही है।

किलो पीछे 25 रुपए की वृद्धि
तिल की उपलब्ध सभी किस्में किलो पीछे 20 से 25 रुपए महंगी हो गई हैं। इस बढ़ोतरी के बाद काली तिल रिकॉर्ड 340 से 400 रुपए किलो, तिल गज्जर 140 से 180 रुपए किलो और तिल सफेद 150 से 200 रुपए किलो पर पहुंच गई है। फलस्वरुप तिल का लड्डू 280 से 300 रुपए किलो और तिल की पापड़ी रिकॉर्ड 300 रुपए किलो पर पहुंच गई है। तेजी का समर्थन उस गुड़ का भी मिल रहा है, जिसने 70 रुपए किलो जैसी हैरान करने वाली कीमत अपने नाम किया हुआ है। शक्कर 45 रुपए किलो पर शांत है।
