बिलासपुर। सीजन ऑन। आसमान छू रहे जूट सुतली के दाम। हैरत और परेशानी इसलिए ज्यादा क्योंकि रफू सुतली रिकॉर्ड 150 से 160 रुपए किलो पर पहुंच गई है।
है विकल्प प्लास्टिक की सुतली के रूप में लेकिन स्वीकार्यता का क्षेत्र अभी भी विस्तार नहीं ले पाया है। लिहाजा तेजी के बावजूद किसानों की खरीदी जूट सुतली में ही निकली हुई है। शुरुआती खरीदी बेहतर बाजार की धारणा को मजबूत कर रही है।

आयात बंद
पश्चिम बंगाल और असम में जूट की व्यावसायिक खेती होती है लेकिन इस बरस बारिश ने जूट की तैयार होती फसल को बेहिसाब नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में आयातित जूट पर निर्भरता कुछ ज्यादा बढ़ी हुई है। संकट इसलिए गहराया हुआ है क्योंकि आयातक देश बांग्लादेश से जूट के आयात पर फिलहाल रोक है। इसलिए देश की बारदाना और सुतली बनाने वाली इकाईयां भंडारित जूट का उपयोग कर रहीं हैं, जो अब खत्म होने की स्थिति में है।

रिकॉर्ड गर्म रफू सुतली
मांग के अनुरूप जूट के नए बैग की उपलब्धता बेहद कमजोर है। इसलिए उपयोग किये जा चुके बारदाने चलन में हैं लेकिन कट-फट चुके ऐसे बारदाने मरम्मत मांग रहे हैं। इसलिए रफू सुतली, सिलाई सुतली से किलो पीछे 20 से 30 रुपए तेज है। शॉर्ट सप्लाई के बीच इसके भाव 150 से 160 रुपए किलो पर पहुंचे हुए हैं जबकि सिलाई की सुतली 130 से 140 रुपए किलो पर पहुंचकर तेजी का संकेत दे रही है।

विकल्प को बेहतर मांग का इंतजार
महंगी जूट की सुतली का सहज और सस्ता विकल्प है प्लास्टिक की सुतली लेकिन 65 से 140 रुपए जैसी कम कीमत पर भी किसानों की खरीदी नहीं है प्लास्टिक की सुतली में। इसलिए बेहतर मांग की प्रतिक्षा के बीच प्लास्टिक की सुतली किराना, कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक गुड्स जैसे कारोबारी क्षेत्र में पैठ मजबूत करने के प्रयास में है। कोशिश रफू करने वाली इकाईयों तक पहुंच बनाने की भी है ताकि की किसानों तक पहुंचने की राह खुल सके।
लोकल फसल कमजोर
जूट की खेती बेहद कमजोर रही। ऐसे में जूट के रेशों के लिए बांग्लादेश से आयात की प्रतीक्षा की जा रही है। फिलहाल आयात बंद है। इसलिए तेजी की धारणा आगे भी बने रहने की है।
- मोहन बजाज, बजाज रोप सेंटर, बिलासपुर
