50 दिन में स्वत: मिल जाएगा मिट्टी में

बिलासपुर। यह प्लास्टिक मात्र 50 दिन के भीतर मिट्टी में पूरी तरह टूट कर जैविक पदार्थ में बदल जाएगा। अहम लाभ यह कि बदला हुआ यह स्वरूप मिट्टी की सेहत न केवल बनाएगा बल्कि समृद्ध भी करेगा।

चुनौती बन चुके प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की गंभीर कोशिशों के बीच बांस के रेशे से बने बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का विकास अब अंतिम चरण में है। अब तक के अनुसंधान के मद्देनजर प्रारंभिक परिणाम वैज्ञानिकों के उत्साह बढ़ाने वाले मिले हैं। उत्साह इसलिए बढ़ा हुआ है क्योंकि यह बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक मात्र 50 दिन में स्वत: खत्म हो जाता है।

ऐसे बनाया जैव प्लास्टिक

बांस के तने से सैल्यूलोज और लिग्निन जैसे प्राकृतिक पॉलिमर निकाले गए। विशेष बायो-रेसीन और प्राकृतिक योजकों के साथ मिश्रित कर पॉलीमर की नई संरचना तैयार की गई। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के पेट्रोलियम या रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया। इसके पूर्व बांस रेशों का निष्कर्षण, जैविक पाॅलीमराइजेशन मोल्डिंग एवं ठोसकरण जैसे जरूरी उपाय किए गए।

100% जैव अवक्रमणीय

बांस के रेशे से बना नया बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक सामान्य प्लास्टिक की तुलना में ज्यादा मजबूत और लचीला होगा। ताप प्रतिरोधी गुण के साथ महत्वपूर्ण यह होगा कि 100% जैव अवक्रमणीय होने की वजह से मात्र 50 दिन में मिट्टी के संपर्क में आने के बाद पूरी तरह टूट कर जैविक पदार्थ में बदल जाता है। यही गुण इसे पर्यावरण हितैषी बनाएगा।

पर्यावरणीय लाभ

प्लास्टिक वेस्ट में कमी आएगी। अपघटन के बाद बचा जैविक पदार्थ मिट्टी में मिलकर उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद करेगा। निर्माण में पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में 30 से 40 फ़ीसदी ऊर्जा कम लगती है। यानी ऊर्जा की भी बचत होती है। सबसे बड़ा लाभ यह कि बांस कार्बन को तेजी से अवशोषित करता है।

संभावना देश और प्रदेश में

देश में बांस को ‘ग्रीन गोल्ड’ कहा जाता है। लगभग 13.96 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में बांस की खेती होती है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अपने छत्तीसगढ़, असम, मिजोरम और उड़ीसा की है। नई खोज ‘ग्रीन इंडस्ट्रियल हब’ की राह खोल सकती है। जहां रोजगार के भरपूर अवसर युवाओं को मिलेंगे।

ग्रीन इकोनॉमी की तरफ एक कदम

बांस से बना बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए उपयोगी नवाचार है। यह न केवल प्लास्टिक प्रदूषण घटाने में सहायक होगा, बल्कि छत्तीसगढ़ जैसे बांस-समृद्ध राज्यों में हरित उद्योग और रोजगार के नए अवसर सृजित करेगा।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर