सातवीं पुण्यतिथि पर प्रभु दत्त खेड़ा को श्रद्धांजलि

                  मोहम्मद उस्मान कुरैशी

कुछ नही दिया अभी तक। बैगाओं के विकास के लिए इतना पैसा है तो स्कूल क्यों नही चलाते। सोंच के बिना, एक्शन ले लेते है। इनकी संख्या कम हो रही है। फर्क पड़ गया है इनके मटेरियल कल्चर पर। शहर के किसी आदमी को हटाओं तो सारा जहान खड़ा हो जाता है। यहां के लोगों को उठाके शहर में बसा दो, तो भूख मर जाए, इस पर कोई ध्यान नही देता। वो किसी को शूद्र नही समझतें । उनकी सभ्यता अच्छी। उनको पालना चाहिए । इनको मुख्य धारा में जोड़़ने शिक्षा ही एक मात्र माध्यम है और वो बड़ा लंबा है। ऐसा सोचने और बोलने वाली की आवाज को खामोश हुए आज छह साल बीत गए।

आज 23 सितंबर यानी उनकी पुण्यतिथि का दिन।‌ साल 2019 सितंबर का महीना। उस दिन इस बियाबान में न जाने कितने लोग आ गए थे उनको अंतिम विदाई देने। इनमें कोई भी तो नहीं थे तो उनका अपना, सगा, रोटी-बेटी, खून के रिश्ते वाला। वो सब पीछे हो गए थे जिनके लिए सालों साल इस बियाबान में ‘बुद्ध’ की तरह जीते रहे। सब के सब अटूट नातेदार बनकर ही तो पहुंचे थे उन्हें अंतिम विदाई देने। अपना किरदार ही ऐसा रच गए कि जो देखा, जो मिले उनके हो गए।

दिल्ली विश्वविसालय में उनकी शिनाख्त प्रोफेसर डाक्टर प्रभु दत्त खेड़ा की थी। सेवा निवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ में अचानकमार के जंगल में आ बसे तो उनकी पहचान यहां के बैगा आदिवासियों के बीच दिल्ली साब की हो गई थी। अब के अचानकमार में टाइगर रिजर्व के बीच में पसरी सड़क के किनारे ठहरा गांव लमनी है। यहां के वन जांच नाका के ठीक सामने बांस और मिट्टी से बनी दीवार पर टंगे खपरैल के छप्पर की झोपड़ी उनका खूबसूरत आरामगाह था। जहां जरूरत की चीजों में ग्लोबल दुनिया से जुड़ने एक ट्रांजिस्टर , जिससे दुनिया जहान की खबरें उड़ती रहती है। थोड़ी सी नींद की छपकी लेने लकड़ी का तख्त जिसके एक तिहाई हिस्से में पुराने अखबार, किताबें, डायरियां काबिज रहती। दो रोटी की जरूरत  पूरी करने मिट्टी तेल की स्टोव, प्रेसर कुकर और चंद बर्तन पसरे रहते।

झोपड़ी के दरवाजे के ठीक सामने छप्पर से उतरी रस्सी पर एक गिलास टंगी रहती जहां। गांव के लोग पाव भर दूध छोड़ जाते थे।  उनकी दिनचर्या सुबह गांव के हेंडपंप पर बैगा आदिवासी बच्चों को नहला-धुला, तेल लगाकर, साफ सुथरे कपड़े पहनने की हिदायत के साथ शुरू होती।

सुबह के ठीक दस बजे समीप के गांव छपरवा के अभ्यारण्य शिक्षण समिति द्वारा संचालित हायर प्ेकेण्डरी स्कूल में उनकी मौजूदगी होती। वे बच्चों को अंग्रेजी व गणित पढ़ाते। शाम को लमनी लौटकर अपनी पोटली से बिस्किट, चना, मूगफल्ली दाना, मुर्रे निकाल कर आस पास मौजूद बच्चों को बांटते। उनकी स्वास्थ्य की जांच करते, फोड़े -फुंसी, जख्मों पर मलहम लगवाते । कागज के छोटे-छोटे पुर्जे और कलम थमाकर अपनी कल्पनाओं को कागज पर उकेरने बच्चों को प्रेरित करते। वनांचल के इन बच्चों की कल्पनाओं में पेड़-पौधे, फल-फूल, पत्तियां, जंगली जानवर होते। जो बताते कि वे ही जंगल के वारिस हैं।

बकौल प्रोफेसर खेड़ा उनकी पैदाइश लाहौर की थी। बंटवारे का दंश भोगा, परिवार के साथ दिल्ली आये । दिल्ली और पंजाब में उनकी शिक्षा पूरी हुई। समाजशास्त्र में पीएचडी करने के बाद दिल्ली विश्वविसालय में ही प्रोफेसर हो गए। पढ़ने के शौक की वजह से ज्यादा समय लाइब्रेरी में ही बीतती। लाइब्रेरी की किताबों में जिन्दगी के फलप्फे तलाशते। शादी नहीं की। 

दिल्ली जैसे बड़े शहर को छोड़़कर सुविधा विहीन वनांचल में आकर रच बस जाने के सवाल पर प्रोफेसर खेड़ा कहते अगर आपको दूसरों को देखना है कि जिन्दगी कैसी होती है, तो घर बार छोड़कर त्याग करना पड़ता है। परिवार की बात सोचोगे तो कुछ नही कर पाओगे। हिंदु धर्म में चार आश्रम है। हम वानप्रस्थ में है। हिन्दुस्तान में इलेक्ट्रीसिटी आए थोड़े समय हुआ है। सन 45 में जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ तब भी बिजली नहीं थी। ये 50 के बाद बिजली आई।  हम तो आडनरी लेम्प दीये में पढ़े है। इसलिए रहने में कोई कठिनाई नहींआई।

प्रोफेसर खेड़ा कहते जब वे यहां आए तो आदिवासी बहुत पिछड़े थे। सन 84 में पहली बार आए।  कुछ लोगों से मिले मन को शांति मिली इसलिय यहीं रूक गए। कठिनाईयां तो बहुत आती है। आसान काम नही है। शुरू में यहां कुछ भी नही था। राशन दुकानें भी नही थी। सौर उर्जा का स्टेशन हमारा बनवाया हुआ है। टाटा की एक टीम आई थी हम अचानकमार में थे। हमने मिलकर ये स्टेशन शिफ्ट करवाया। आपूर्ति निगम में राव साहब होते थे। उनके साथ मिलकर काम किया था। खाद्यान्न के लिए साल 1987 में चलती फिरती गाड़ी शुरू कराई।

प्रोफेसर खेड़ा कहते काफी समय यहां रहने के बाद समझ आया कि शिक्षा के बिना कुछ नही हो सकता। सरकार यहां कोई स्कूल खोल नही रही थी। वन विभाग के सहयोग से छपरवा में हायर सेकेण्डरी स्कूल खुलवाया। दो बच्चे बैगा 12 वीं पास कर गए। यहां कालेज खोल दिया जाए तो अच्छा रहेगा। इससे लड़कियों को भी मौका मिल पाएगा। यहां के जो बच्चे पास होते है उनमें से एक चौथाई ही बाहर पढ़ने जा पाते है। उनकी आमदनी नहीं कि कोटा में रह के पढ़ पाए।

अभी अभ्यारण के इस स्कूल में 108 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे है। जो आस पास वनांचल के गांवों से 10-15 किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं।
बैगाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जताते प्रोफेसर खेड़ा कहते उनका स्वास्थ्य ठीक नही रहता। खाना नही मिलता। इन्होने हंटिंग बंद कर दी गई। पहले गोस्त खाते थे अब गोस्त मिलना मुश्किल हो गया। महंगा हो है। यहां इनको सूअर रखने की इजाजत दी जाए। क्योकि ये अच्छे है इनको देखभाल करने के लिये पर नही सरकार जरा कमजोर है। ज्यादातर लोग दारू पीते है । दारू पीते है तो खाना ठीक नही मिले तो टीबी हो जाता है अधरंग आ जाता है। दारू पीतें है तो खाना मिलनी चाहिए। उस कारण बीमारियां बहुत आ गई। ये अनपढ़ लोग है। गलती से अपना खुराक ठीक करने कभी सूअर को पकड़ कर खा ही ले तो वन विभाग वाले नहीं छोड़ते। वे जंगली सूअर न खाएं तो क्या खाएं। सरकार भी पूरी सोंचती नही है। वो कोई ऐसी जाति थोड़ी है जो खत्म हो रही है। एक गिलहरी को खाया तो जेल भेज दिया। मतलब सोंच के बिना एक्शन ले लेतें है। ये इनके लिए अच्छा नही है।

          कंबख्त आसमान पर थूंक गया …
लमनी में जहां प्रोफेसर पीडी खेड़ा का जहां पर खूबसूरत आशियाना हुआ करता था वहीं पर ही उसकी मूर्ति स्थापित की गई है। इसकी भी नाक किसी कंबख्त ने तोड़ दी है। जहां मूर्ति लगी है उसके ठीक सामने लमनी का वन जांच नाका है।जहां चौबीस घंटे वन कर्मियों की तैनाती रहती है। प्रोफेसर पीडी खेड़ा की मूर्ति को खंडित कर दिए जाते की सूचना पुलिस और वन विभाग के अफसरों को है कि नहीं इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।