‘खोइला’ या ‘सुखरी’ भी अब बाजार में

भाटापारा। 80 रुपए प्रति 250 ग्राम और 70 रुपए प्रति 250 ग्राम। यह उस टमाटर और बैगन की कीमत है जिसे ‘खोइला’ या ‘सुखरी’ के नाम से पहचाना जाता है। पीढ़ियों से चला आ रहा ‘खोईला’ अब शहर के बाजार में भी पहुंच चुका है।

अब ऑफ सीजन में भी बना सकेंगे टमाटर, बैगन, कुम्हड़ा, भिंडी, तुरई और लौकी की सब्जी। इसी तरह भाजी फसलों की चुनिंदा प्रजातियां भी बहुत जल्द आने वाली हैं खोईला या सुखरी के रूप में। देवांगन खजूर वाला के संचालक मयंक देवांगन की कोशिश सफल रही ‘खोईला’ को लेकर। बेहतर प्रतिसाद के बाद अब कुछ और सब्जी प्रजातियों में प्रयोग चल रहा है।प्रतिसाद उत्साह बढ़ाने वाला

प्रतिसाद उत्साह बढ़ाने वाला

नवाचार के पक्षधर मयंक देवांगन इससे पहले अईरसा, गुझिया, ठेठरी, खुरमी और अलसी के लड्डू बना चुके हैं। छत्तीसगढ़ी व्यंजनों में प्रमुख यह सभी व्यंजन अब पूरे साल मांग में आ चुके हैं। इसे देखते हुए बतौर प्रयोग ‘खोईला’ में टमाटर और बैगन को लिया गया। खरीदी को लेकर रुझान जैसा बना हुआ है उसे देखते हुए अब कुछ और सब्जी प्रजातियों पर प्रयोग किया जा रहा है। जिसके परिणाम बहुत जल्द आने की संभावना है।इसलिए ‘खोईला’

इसलिए ‘खोईला’

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण खाद्य संस्कृति बेहद समृद्ध है। गर्मी के मौसम में सब्जियों को सुखाकर संरक्षित करने की परंपरा सदियों पुरानी है। बारिश और शीतकाल में लगभग सभी सब्जियां नहीं मिलती इसलिए ‘खोईला’ के नाम से पहचानी जाने वाली सूखी सब्जियां काम में आती है। इसके अलावा ताजी सब्जियों की निरंतरता बनी रहती है और बाजार की महंगी सब्जियों की खरीदी पर होने वाले खर्च से भी बचाता है ‘खोईला’।

टमाटर और बैगन खूब

टमाटर 80 रुपए में 250 ग्राम और इतनी ही मात्रा में बैगन का खोईला 70 रुपए में विक्रय कर रहे मयंक देवांगन का कहना है कि कुछ और प्रजातियों पर काम किया जा रहा है। परिणाम सफल रहने पर उनकी भी उपलब्धता तय की जाएगी। बताते चलें कि अपने प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कुम्हड़ा, भिंडी, तुरई और कोचई के साथ भाजी की चुनिंदा प्रजातियां भी खोईला के रूप में उपयोग की जातीं हैं।